महान मुस्लिम वैज्ञानिक जिन्होंने नवयुग की नींव रखी


महान मुस्लिम वैज्ञानिक जिन्होंने नवयुग की नींव रखी
अगर आपसे कहा जाए मुसलमान कोलम्बस से पांच सौ वर्ष पूर्व अमरीका पहुंच चुके थे। हवाई जहाज की कल्पना सबसे पहले कुरतुबा के एक मुसलमान अब्बास इब्ने फरनास ने नवीं शताब्दी में की और कुछ सेकण्ड उसका बनाया हुआ जहाज हवा में उड़ा भी। इसी वैज्ञानिक ने पहली घड़ी बनाई। मुसलमानों ने सबसे पहले खाने के लिए छुरी-कांटे का इस्तेमाल किया। कैमरे की कल्पना इब्नुल हैशम ने ग्यारहवीं शताब्दी में की। अरब मुसलमानों ने नहाने-धोने के लिए सबसे पहले सुगंधित साबुनों का प्रयोग किया। एक मुसलमान नेत्र विशेषज्ञ इब्नुल नफीस कठिन से कठिन आंख का ऑपरेशन कर सकता था। अलराजी ने सबसे पहले एल्कोहल को ऐन्टीसेप्टिक के तौर पर प्रयोग किया। पहला ग्लोब 1279 में अल-अरदी ने बनाया जो जर्मनी के शहर ड्रेस्डन के संग्रहालय में सुरक्षित है।
बारहवीं शताब्दी में अरबी भाषा का वही महत्व था जो आज अंग्रेजी का है। ...तो क्या आप विश्वास करेंगे? लेकिन यह सत्य है। आज भी यूरोप के पुस्तकालयों में मुसलमानों द्वारा गणित, विज्ञान, भूगोल, भौतिक विज्ञान , जीव विज्ञान, भूगर्भ शास्त्र, आयुर्विज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाज शास्त्र, अंतरिक्ष ज्ञान, संगीत, कला, भवन निर्माण, मानव विज्ञान और सागर विज्ञान पर ढाई लाख पुस्तकें रखी हैं जिनसे आज तक मुसलमान कोई फायदा नहीं उठा सके हैं।
उपरोक्त तथ्य चौंका देने वाले है। आठवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी के इस्लामी युग को स्टैनले लेन पोल अपनी पुस्तक
‘Universal History of the World’ के छठे खण्ड में ‘ Golden Age of the Arabs’ कहता है। स्पेन, सिसली और यरूशलम में जब ईसाईयों का मुसलमानों से सम्पर्क हुआ तो वह उनकी उत्तम जीवनशैली और सभ्यता देखकर चकित रह गए।
एक पश्चिम विद्वान सी. बोयर लिखता है:-


“At the beginning of 12th centuy, no European could expect to be a Mathematician or Astronomer with out a good knoeledge of Arabic.” (History of Mathematics(NY-1968)
’’ बारहवीं शताब्दी के आरम्भ में कोई भी पश्चिमवासी अरबी भाषा  के ज्ञान के बगैर खगोल शास्त्री या गणित शास्त्री बनने की आशा तक नहीं कर सकता था ’’
 पश्चिम की सबसे उत्तम मानी जाने वाली ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय में आज भी मुस्लिम विद्वानों की पुस्तकों के लातीनी और दूसरी यूरोपीय भाषाओं में किए गए अनुवाद मौजूद हैं। लेकिन अफसोस यूरोप वालों ने अल्पदृष्टि का परिचय देते हुए मुसलमानों के अरबी नामों को लातीनी में  बदल दिया ताकि मुसलमानों को कभी पता न चले कि हमने विज्ञान और कला के क्षेत्र में क्या कारनामे अंजाम दिए। जिन लोगों के नाम बदले गये वह हैं- इब्ने सीना का
Avecinna, इब्नुल हैसम का Alhazan, जाबिर बिन हैयान का Geber, जकरिया अल राजी का Rhazes, अल जरकावी का Arzachel, इब्ने रूश्द का Averroes, अबु बक्र इब्ने बाजह का Avemace, ताकि आने वाली नस्लें यह न समझें कि मुसलमानों में इतने महान खोजकर्ता और वैज्ञानिक गुजरे हैं जिनके जलाए ज्ञानदीप के कारण चौदहवीं और पंद्रहवी शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण व धार्मिक विपलव जैसे आंदोलन चले और आज यूरोप विकास और सभ्यता के शिखर पर पहुंचा। परन्तु मुसलमानों और यूरोपियों में मुख्य अंतर यह है कि मुसलमानों ने अपने ज्ञान का मानवता की भलाई के लिए इस्तेमाल किया और पश्चिम ने उपनिवेश के विस्तार और मानवता के शोषण के लिए।
स्वयं यूरोप के कुछ सत्यवादी विद्वान जैसे स्टैनले लेन पोल, जेएच केलोग और विल ज्यूरां आदि ने यूरोप के विकास और उन्नति के लिए मुसलमानों के मार्गदर्शन की सराहना की है।
आवश्कता इस बात की है कि मुसलमानों के ज्ञान व विद्या में किए गये कारनामों को नई  नस्ल के सामने पेश किया जाए और उन्हें यह एहसास कराया जाए कि इस्लाम विज्ञान और प्रगति का विरोधी नहीं है। वह पश्चिमी जगत की भौतिक उन्नति देखकर हीन-भावना का शिकार न हों और विज्ञान व टेक्नाॅलाजी के क्षेत्र में आगे आएं।
आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि वह सभी वैज्ञानिक और शोधकर्ता मदरसों से पढ़कर निकले थे। कुरआन और हदीस उनकी प्रेरणा के स्रोत थे। कई वैज्ञानिक और खोजकर्ता तो कुरआन, हदीस, फिक्ह (धर्मशास्त्र) के विद्वान थे और साथ ही साथ वह नई-नई खोजों में भी व्यस्त रहते थे। इससे  यही सिद्ध होता है कि इस्लाम कहीं भी मनुष्य की प्रगति में रूकावट नहीं डालता।

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