अल्लाह की निशानियां और नेमतें इंसान को करती हैं हैरान, कायनात के राज देखकर साइंस भी हैरत में : डॉ. खालिद अय्यूब


गोरखपुर। रहमतनगर स्थित हजरत मुहम्मद अली बहादुर शाह अलैहिर्रहमा के तीन दिवसीय 110वें उर्स-ए-पाक के अवसर पर जलसा-ए-ईद मिलादुन्नबी का भव्य आयोजन किया गया। जलसे में उलमा-ए-किराम ने अल्लाह की कुदरत, उसकी अनगिनत नेमतों, कुरआन की हिकमत, कायनात की निशानियों और औलिया-ए-किराम की शिक्षाओं पर विस्तार से रोशनी डाली। बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत कर उलमा की तकरीरें सुनीं और आध्यात्मिक वातावरण में अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का संकल्प लिया।

जलसे की अध्यक्षता पीरे तरीकत हजरत मौलाना अहमद रज़ा ख़ां नक्शबंदी कमालपुरी ने की, जबकि संचालन कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने किया। कार्यक्रम का आगाज कारी शरफुद्दीन मिस्बाही की तिलावत-ए-कुरआन-ए-पाक से हुआ। इसके बाद मौलाना अली अहमद, मुफ्ती सालेह नक्शबंदी और कासिद रजा इस्माइली ने नात-ओ-मनकबत पेश कर महफिल में रूहानी कैफियत पैदा कर दी।

जलसे के मुख्य वक्ता तहरीक उलमा-ए-हिंद राजस्थान के चेयरमैन डॉ. मुफ्ती मुहम्मद खालिद अय्यूब मिस्बाही ने कहा कि इंसान जिस विशाल कायनात में अपनी जिंदगी गुजार रहा है, उसके हर हिस्से में अल्लाह की कुदरत, हिकमत और उसकी निशानियां दिखाई देती हैं। आसमान की विशालता से लेकर धरती की बनावट तक, सूरज और चांद की नियमित गति से लेकर रात और दिन के बदलने तक, हर घटना इंसान को सोचने और अपने पैदा करने वाले रब को पहचानने की दावत देती है।

उन्होंने कहा कि विज्ञान आधुनिक उपकरणों और शोध के जरिए कायनात के रहस्यों को समझने की लगातार कोशिश कर रहा है। इंसान ने अंतरिक्ष की गहराइयों से लेकर सूक्ष्म संसार तक कई महत्वपूर्ण खोजें की हैं, लेकिन हर नई खोज के साथ कायनात की विशालता और उसकी जटिलता का एहसास और बढ़ जाता है। जितना इंसान जानता जाता है, उतना ही उसे यह महसूस होता है कि अभी ज्ञान के अनगिनत दरवाजे उसके सामने खुले हुए हैं।

डॉ. खालिद अय्यूब ने कहा कि कुरआन-ए-पाक इंसान को केवल पढ़ने की किताब नहीं, बल्कि गौर-ओ-फिक्र और अपनी जिंदगी को सुधारने की किताब के रूप में मार्गदर्शन देता है। कुरआन इंसान को आसमान और जमीन की निशानियों पर विचार करने, अपने आसपास की दुनिया को समझने और अल्लाह की कुदरत का एहसास करने की प्रेरणा देता है। सूरज की रोशनी, चांद की चमक, बारिश का बरसना, हवाओं का चलना, जमीन से विभिन्न प्रकार की फसलों और पेड़-पौधों का निकलना तथा इंसान के शरीर की अद्भुत संरचना—ये सभी ऐसी निशानियां हैं जो इंसान को चिंतन के लिए मजबूर करती हैं।

उन्होंने कहा कि इंसान को अल्लाह ने अनगिनत नेमतों से नवाजा है, लेकिन अक्सर वह उन्हीं नेमतों की कद्र नहीं करता जो हर पल उसके पास मौजूद हैं। सांस लेने की क्षमता, आंखों से देखने की शक्ति, कानों से सुनना, बोलने की क्षमता, समझने और सोचने की ताकत, स्वस्थ शरीर, परिवार, रोजी-रोटी, पानी, हवा और इल्म—ये सभी अल्लाह की बेशुमार नेमतें हैं। इंसान को चाहिए कि वह इन नेमतों को केवल सुविधा का साधन न समझे, बल्कि इनके लिए अपने रब का शुक्र अदा करे और इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करे।

उन्होंने कहा कि साइंस कायनात के नियमों, घटनाओं और उनके प्रभावों का अध्ययन करती है, जबकि कुरआन इंसान को इन निशानियों पर गौर करने और अपने पैदा करने वाले रब की पहचान की ओर ले जाता है। ज्ञान और विज्ञान का उद्देश्य इंसान को घमंड और अहंकार में डालना नहीं, बल्कि उसे सच्चाई, विनम्रता और जिम्मेदारी का एहसास कराना होना चाहिए। विज्ञान की तरक्की तभी सार्थक है जब उसका इस्तेमाल इंसानियत की भलाई, समाज की बेहतरी और दुनिया के लिए लाभकारी कार्यों में किया जाए।

डॉ. मिस्बाही ने औलिया-ए-किराम की जिंदगी और उनके पैगाम पर भी रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि बुजुर्गाने दीन ने लोगों को अल्लाह की निशानियों से सबक लेने, अपने रब को याद करने, अपने अंदर सुधार पैदा करने और समाज के लिए लाभकारी बनने की शिक्षा दी। उनकी जिंदगी में इल्म के साथ अमल, इबादत के साथ इंसानियत, रूहानियत के साथ अच्छे अखलाक और व्यक्तिगत सुधार के साथ समाज की खिदमत का खूबसूरत मेल दिखाई देता है।

उन्होंने कहा कि आज इंसान आधुनिक तकनीक के जरिए चांद और सितारों तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है। नई-नई वैज्ञानिक उपलब्धियां सामने आ रही हैं और दुनिया लगातार आधुनिक होती जा रही है, लेकिन इसके साथ इंसान को अपने दिल और चरित्र की दुनिया को भी संवारने की जरूरत है। बाहरी दुनिया को समझने के साथ अगर इंसान अपने अंदर झांकना सीख जाए, अपनी कमियों को पहचान ले और अपने किरदार को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो समाज में वास्तविक बदलाव पैदा हो सकता है।

उन्होंने युवाओं को विशेष संदेश देते हुए कहा कि नई पीढ़ी आधुनिक शिक्षा और विज्ञान हासिल करे, शोध और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़े, लेकिन अपनी नैतिक और आध्यात्मिक जिम्मेदारियों को हरगिज न भूले। इल्म के साथ अच्छे अखलाक, शोध के साथ सच्चाई, तरक्की के साथ इंसानियत और अधिकारों के साथ जिम्मेदारी का एहसास जरूरी है। ऐसा ज्ञान ही व्यक्ति और समाज के लिए फायदेमंद साबित होता है।

अध्यक्षता करते हुए पीरे तरीकत हजरत मौलाना अहमद रजा खां नक्शबंदी कमालपुरी ने कुरआन-ए-पाक की तालीम को समझने, अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करने और बुजुर्गाने दीन की नेक जिंदगी से सबक लेने की नसीहत की। उन्होंने कहा कि उर्स और धार्मिक महफिलों का उद्देश्य केवल रस्म की अदायगी नहीं, बल्कि दिलों की इस्लाह, किरदार की सुधार और इंसान को नेक रास्ते की ओर लाना है। यदि ऐसी महफिल से इंसान की जिंदगी में अच्छा बदलाव पैदा हो तो यही उसकी वास्तविक कामयाबी है।

जलसे में मुफ्ती अख्तर हुसैन मन्नानी, मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी, अली गजनफर शाह, मुहम्मद जैद, हाजी अली रजा, इनाम खैरी, मुहम्मद अमान, मुहम्मद जैद मुस्तफाई, सैफी, शहजादे कुरैशी, बब्लू कुरैशी, रेहान कुरैशी, नफीस खैरी, गुलाम जिलानी, मौलाना अली अहमद, यासीन, अली नुसरत शाह, अली अशहर शाह, हाफिज रहमत अली निजामी, अली मुजफ्फर शाह, अली जफर शाह, मुजफ्फर हसनैन रूमी, आसिफ महमूद, नेहाल अहमद, मौलाना महमूद रजा कादरी, जैद, चिंटू, सैयद नदीम अहमद, शहबाज सिद्दीकी, समीर, नवेद आलम, हाजी फैज खान, मौलाना तफज्जुल हुसैन, मौलाना सद्दाम बरकाती, मौलाना दानिश, हाफिज मिनहाजुद्दीन सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।

कार्यक्रम के अंत में मुल्क में अमन-ओ-अमान, भाईचारे, खुशहाली, तरक्की और सभी के लिए खैर व बरकत की दुआ की गई। अकीदतमंदों ने बुजुर्गाने दीन की शिक्षाओं को अपनी जिंदगी में अपनाने और समाज में मोहब्बत, भाईचारे तथा इंसानियत को बढ़ावा देने का संकल्प लिया।

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