तुर्कमानपुर में इस्लामी बहनों की विशेष संगोष्ठी, हजरत शैख अब्दुल कादिर जीलानी अलैहिर्रहमा की इल्मी खिदमात, नेक जिंदगी और इस्लाही पैगाम पर हुई विस्तार से तकरीर
गोरखपुर। मकतब इस्लामियात, चिंगी शहीद इमाम चौक, तुर्कमानपुर में इस्लामी बहनों की एक विशेष इल्मी व इस्लाही संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हजरत शैख अब्दुल कादिर जीलानी अलैहिर्रहमा की इल्मी खिदमात, उनकी नेक जिंदगी, रूहानी खूबियों, इस्लाही कोशिशों और उनके बताए हुए नेक तरीके पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में इस्लामी बहनों ने शिरकत की और वक्ताओं की तकरीर को ध्यानपूर्वक सुना।
कार्यक्रम का मुख्य विषय “हजरत शैख अब्दुल कादिर जीलानी अलैहिर्रहमा की इल्मी खिदमात व नेक बंदे और उनका तरीका” रहा। वक्ताओं ने कहा कि बुजुर्गाने दीन ने अपनी पूरी जिंदगी इल्म की रोशनी फैलाने, इंसानों की इस्लाह करने और समाज को बुराइयों से निकालकर नेक रास्ते की ओर ले जाने में लगा दी। उनकी जिंदगी में इल्म और अमल का ऐसा खूबसूरत तालमेल नजर आता है, जो आज भी इंसानों के लिए मार्गदर्शन का जरिया है।
मुख्य वक्ता मुफ्तिया कहकशां फिरदौस ने कहा कि बुजुर्गाने दीन से मोहब्बत का असल तकाजा यह है कि उनकी इल्मी विरासत को समझा जाए और उनके नेक किरदार को अपनी जिंदगी में उतारने की कोशिश की जाए। उन्होंने कहा कि किसी बुजुर्ग का नाम लेना, उनकी महफिल में शामिल होना या उनके कारनामों का जिक्र करना अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन सच्ची पैरवी उस समय होगी जब उनकी तालीम का असर हमारे व्यवहार, अखलाक और रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई दे।
उन्होंने कहा कि हजरत शैख अब्दुल कादिर जीलानी अलैहिर्रहमा की जिंदगी इल्म, इबादत, सच्चाई, परहेजगारी, अच्छे अखलाक और इंसानियत की खिदमत का बेहतरीन नमूना है। उन्होंने लोगों को अपने अंदर सुधार पैदा करने, बुराइयों से बचने और नेक अमल की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी। आज जरूरत इस बात की है कि हम बुजुर्गों की जिंदगी को केवल सुनने और पढ़ने तक सीमित न रखें, बल्कि उससे अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का सबक हासिल करें।
आलिमा अरबिया इस्माईली ने अपनी तकरीर में इल्म की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि किसी भी समाज की तरक्की में इल्म की बुनियादी भूमिका होती है। दीनी इल्म इंसान को केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि उसे अपने कर्तव्यों का एहसास भी कराता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए दीनी तालीम हासिल करना और अपने बच्चों की सही तर्बियत करना बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
सादिया नूर ने कहा कि बुजुर्गाने दीन की जिंदगी में सादगी, विनम्रता, इंसानियत और दूसरों की मदद का जज्बा प्रमुख रूप से दिखाई देता है। उनकी जिंदगी से यह संदेश मिलता है कि इंसान जितना अधिक इल्म हासिल करे, उतना ही उसके अंदर विनम्रता और जिम्मेदारी का भाव पैदा होना चाहिए। उन्होंने इस्लामी बहनों से अपने घरों में अच्छे माहौल को बढ़ावा देने और बच्चों की तालीम व तर्बियत पर विशेष ध्यान देने की अपील की।
रहनुमा कुरैशी ने महिलाओं की सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों पर चर्चा करते हुए कहा कि घर किसी भी समाज की पहली पाठशाला होता है। मां की गोद बच्चे की पहली तर्बियतगाह होती है। यदि घर का माहौल दीनी, शैक्षिक और नैतिक मूल्यों से जुड़ा हो तो उसका सकारात्मक प्रभाव बच्चों के व्यक्तित्व पर पड़ता है। इसलिए महिलाओं को स्वयं भी इल्म से जुड़ना चाहिए और अपनी अगली पीढ़ी को भी अच्छी तालीम, अच्छे अखलाक और इंसानियत का संदेश देना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि आज के दौर में बच्चों और नौजवानों के सामने तरह-तरह की चुनौतियां हैं। ऐसे समय में केवल किताबों की जानकारी पर्याप्त नहीं, बल्कि अच्छे किरदार और सही सोच की भी जरूरत है। परिवार और समाज के जिम्मेदार लोगों को मिलकर बच्चों की तर्बियत पर ध्यान देना होगा। उन्होंने कहा कि बुजुर्गाने दीन की जिंदगी से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को अपने इल्म के साथ अपने अमल और अखलाक को भी बेहतर बनाना चाहिए।
संगोष्ठी में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि महिलाओं को अपनी दीनी जिम्मेदारियों के साथ समाज के सुधार में भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। वक्ताओं ने कहा कि एक शिक्षित और अच्छे अखलाक वाली महिला पूरे परिवार के वातावरण को बदलने की क्षमता रखती है। वह बच्चों में सच बोलने, बड़ों का सम्मान करने, छोटों से मोहब्बत करने और जरूरतमंदों की मदद करने जैसे गुण पैदा कर सकती है।
कार्यक्रम के दौरान नातिया कलाम का भी आयोजन हुआ। सना खान, सना फातिमा और सुमैया कुरैशी ने नात पेश कर महफिल को रूहानी रंग से भर दिया। नातिया कलाम के दौरान मौजूद इस्लामी बहनों ने भी श्रद्धा और अदब के साथ सहभागिता की। कार्यक्रम का संचालन मुबश्शिरा कुरैशी ने किया और उन्होंने कार्यक्रम के विभिन्न हिस्सों को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया।
संगोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि इल्मी और इस्लाही कार्यक्रमों की जरूरत आज पहले से कहीं ज्यादा है। ऐसे कार्यक्रमों के जरिए महिलाओं और बच्चियों को दीनी तालीम, अच्छे अखलाक और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मकतब इस्लामियात जैसे संस्थानों की कोशिशें समाज में दीनी और नैतिक शिक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि बुजुर्गाने दीन की इल्मी विरासत हमारे लिए एक अमानत है। इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना केवल उलमा की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर परिवार की जिम्मेदारी है। खासकर माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को अपने बुजुर्गों की जिंदगी, उनकी इल्मी सेवाओं और उनके नेक किरदार से परिचित कराएं, ताकि नई पीढ़ी अपनी धार्मिक और नैतिक जड़ों से जुड़ी रहे।
कार्यक्रम के अंत में मुल्क की तरक्की, समाज में अमन व भाईचारे, उम्मत की सलामती और पूरी इंसानियत की खुशहाली के लिए दुआ की गई। आयोजकों ने कहा कि मकतब इस्लामियात में इस प्रकार के इल्मी व इस्लाही कार्यक्रमों का उद्देश्य महिलाओं और बच्चियों को दीनी तालीम से जोड़ना, उनके अंदर अच्छे अखलाक को मजबूत करना और उन्हें एक बेहतर परिवार तथा बेहतर समाज के निर्माण के लिए प्रेरित करना है।
संगोष्ठी में शामिल इस्लामी बहनों ने कार्यक्रम को उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताते हुए कहा कि इस तरह की महफिलों से दीनी जानकारी बढ़ाने के साथ-साथ अपनी जिंदगी और परिवार की तर्बियत को बेहतर बनाने की प्रेरणा मिलती है। उपस्थित लोगों ने भविष्य में भी ऐसे इल्मी, इस्लाही और तर्बियती कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाने की जरूरत पर जोर दिया।




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