मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती अख्तर हुसैन मन्नानी ने बताया कि यह वाक्या यह है कि खुदा के हुक्म से उन्होंने अपने बेटे हजरत इस्माइल जो बुढ़ापे के दौरान सालों की दुआओं के बाद पैदा हुए उनको खुदा की राह में कुर्बान करने से ताल्लुक रखता है। खुदा ने हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को ख्वाब में अपनी सबसे अजीज चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया। हजरत इब्राहीम ने अपने तमाम जानवरों को खुदा की राह में कुर्बान कर दिया। यह ख्वाब दो मर्तबा हुआ। तीसरी मर्तबा हजरत इब्राहीम समझ गये कि खुदा उनसे प्यारे लाडले की कुर्बानी का तालिब है। यह अल्लाह की अजमाइश का सबसे बड़ा इम्तिहान था। अल्लाह के हुक्म से उन्हें जिब्ह करने के लिये मीना ले गये। हजरत इब्राहीम जब बेटे के साथ कुर्बानीगाह पहुंचे तो बेटे ने कहा अब्बा मुझे रस्सियों से बांध दीजिए ताकि मैं तड़प न सकूं। अपने कपड़ों को बचाइए ताकि मां खून देखकर बेचैन न हो जाएं और गम में डूब जाएं। छुरी तेज कर लीजिए ताकि गर्दन आसानी से कट जायें और जान आसानी से निकल जाएं। जब हजरत इब्राहीम अपने जिगर के टुकड़े की गर्दन पर छुरी चलाने लगे तो बार-बार चलाने के बावजूद गला नहीं कटा। इसी बीच गैबी आवाज आई। बस ऐ इब्राहीम तुमने आज अपना ख्वाब पूरा किया। तुम्हें तुम्हारे रब ने पसंद किया, तुम इम्तिहान में कामयाब हुए। इसके बाद से कुर्बानी की रिवायत शुरू हुई। कैसा अजीबो गरीब मंजर था छूरी चलाने वाला भी पैगम्बर ओर जिस पर छुरी चलायी जा रही है वह भी पैगम्बर। अल्लाह को सिर्फ उनके हिम्मत और फरमाबरदारी का इम्तिहान लेना था इसलिए जब आंख खोली तो देखा एक दुम्बा़ जब्ह किया हुआ पड़ा है और लड़का खड़ा मुस्कुरा रहा है। उसी लड़के की नस्ल से पैगम्बरों के सरदार और आखिरी नबी पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम पैदा हुए और इस यादगार के लिए अल्लाह ने उनकी उम्मत को यह तोहफा अता किया। इस उम्मत का कोई भी मुसलमान कुर्बानी करेगा। तो उसे उस अजीम कुर्बानी के सवाब (पुण्य) के बराबर अता होगा जो हजरत इब्राहीम ने कुर्बानी की थी।
शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि साहाबा ने अर्ज किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम यह कुर्बानी क्या है। आप ने फरमाया तुम्हारे बाप हजरत इब्राहीम की सुन्नत है। कुर्बानी हजरते इब्राहीम की सुन्नत है जो इस उम्मत के लिए बरकरार रखी गयी है। और पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम को इसका हुक्म दिया गया है। इर्शादे खुदावंदी है कि ऐ महबूब अपने रब के लिए नमाज पढ़ो और कुर्बानी करो। खास जानवर को खास दिनों में तकरीब (जिब्ह) की नियत से जिब्ह करने को कुर्बानी कहते हैं। हदीस में इसके बेशुमार फजीलतें आयीं हैं। हदीस में आया है कि हुजूर ने फरमाया कि यौमे जिलहिज्जा (दसवीं जिलहिज्जा) में इब्ने आदम का कोई अमल खुदा के नजदीक खून बहाने यानि कुर्बानी करने से ज्यादा प्यारा नहीं है। वह जानवर कयामत के दिन अपने सींग और बाल और खुरों के साथ आएगा और कुर्बानी का खून जमीन पर गिरने से पहले खुदा के नजदीक मकामे कुबूलियत में पहुंच जाता है। लिहाजा इसको खुशी से करो।
दूसरी हदीस में आया है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने फरमाया कि जिसे कुर्बानी की ताकत हौ और वह कुर्बानी न करे। वह हमारी ईदगाहों के करीब न आये। एक और हदीस में पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने फरमाया जिस ने खुश दिली व दिली तलबे सवाब होकर कुर्बानी की तो वह आतिशे जहन्नम से रोक हो जाएगा।
हुजूर ने इरशाद फरमाया कि जो रूपया ईद के दिन कुर्बानी मे खर्च किया गया उस से ज्यादा कोई रूपया प्यारा नहीं। एक हदीस में आया है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि कुर्बानी तुम्हारे बाप हजरत इब्राहीम की सुन्नत है। लोगों ने अर्ज किया इसमें क्या सवाब है। फरमाया हर बाल के बदले नेकी है। अर्ज कि उनका क्या हुक्म है फरमाया उनके हर बाल के बदले में नेकी है।
एक हदीस में आया है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने फरमाया सबसे पहले जो काम आज हम करेंगे वह यह है कि नमाज पढ़ेगें फिर उसके बाद कुर्बानी करेंगे। जिसने ऐसा किया उसने हमारे तरीके को पा लिया और जिसने पहले जिब्ह कर लिया वह गोश्त है जो उसने पहले से अपने घर वालों के लिए तैयार किया। कुर्बानी से उसका कुछ ताल्लुक नहीं है।
एक मशहूर हदीस है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि सींग वाला मेढा लाया जाए जो स्याही में चलता हो (तीन बार इरशाद फरमाया), और स्याही में बैठता हो पेट स्याह हो और आंखे स्याह (काला) कुर्बानी के लिए हाजिर किया गया। हुजूर ने फरमाया छुरी लाव, फिर फरमाया इसको पत्थर पर तेज कर लो। फिर हुजूर ने छुरी ली और मेढें को लिटाया और उसे जिब्ह किया और दुआ की इलाही तू इसको मेरे व मेरी आल और उम्मत की तरफ से कुबूल फरमा।
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कुर्बानी मालिके निसाब पर वाजिब
इस त्योहार में हर वह मुसलमान जो आकिल बालिग मर्द औरत जिसके पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना का मालिक हो या इनमें से किसी की कीमत के सामाने तिजारत हो या तकरीबन 36 हजार रूपया हो उसके ऊपर कुर्बानी वाजिब है । कुर्बानी के लिए मुकीम होना भी जरूरी है। इसी वजह से हर मुसलमान इस दिन कुर्बानी करवाता है। जानवर जिब्ह करने के वक्त उसकी नियत होती है कि उसके अंदर की सारी बदअख्लाकी और बुराई सबकों मैने इसी कुर्बानी के साथ जिब्ह कर दिया और इसी वजह से मजहबे इस्लाम में ज्यादा से ज्यादा कुर्बानी का हुक्म किया गया है। कुर्बानी का अर्थ होता है कि जान व माल को खुदा की राह में खर्च करना। इससे अमीर, गरीब इन अय्याम में खास बराबर हो जाते है और बिरादराने इस्लाम से भी मोहब्बत का पैगाम मिलता है। कुर्बानी हमें दर्स देती है कि जिस तरह से भी हो सके अल्लाह की राह में खर्च करो। कुर्बानी से भाईचारगी बढ़ती है।
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कुर्बानी का जानवर
कुर्बानी के जानवर की उम्र महत्वपूर्ण होती है। ऊंट पांच साल, भैंस दो साल, बकरी व खशी एक साल । इससे कम उम्र होने की सूरत में कुर्बानी जायज नहीं ज्यादा हो तो अफजल है। अलबत्ता दुम्बा या भेड़ छः माह का जो इतना बड़ा हो कि देखने में साल भर का मालूम हेाता हो उसकी कुर्बानी जायज है। कुर्बानी के जानवर को एैब से खाली होना चाहिए। अगर थोड़ा से एैब हो तो कुर्बानी हो जायेगी मगर मकरूह होगी और ज्यादा हो तो कुर्बानी होगी ही नहीं। अंधे जानवर की कुर्बानी जायज नहीं इतना कमजोर जिसकी हड्डियां नजर आती हो। और लगंड़ा जो कुर्बानी गाह तक अपने पांव से जा न सकें और इतना बीमार जिसकी बीमारी जाहिर हो जिसके कान या दमू तिहायी से ज्यादा कटे हो इन सब की कुर्बानी जायज नही। ऊंट और भैंस वगैरह में सात आदमी शिकरत कर सकते हैं जबकि उन सब की नियत तकरीब की हों। कुर्बानी और अकीका की शिरकत हो सकती है। जानवर को जिब्ह करने के बाद हाथ पांव कांटने से उस वक्त तक रूके रहे जबतक कि उसके तमाम आजार से रूह निकल न जायें।
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कुर्बानी के मुताल्लिक जरूरी मसायल
गोरखपुर। मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि जो मालिके निसाब अपने नाम से एक बार कुर्बानी कर चुका है और दूसरे साल भी वह मालिके निसाब है तो फिर इस पर अपने नाम से कुर्बानी वाजिब है। (अनवारूल हदीस)
बाज लोग यह ख्याल करते हैं अपनी तरफ से जिदंगी में सिर्फ एक बार कुर्बानी वाजिब है यह शरअन गलत है और बेबुनियाद है इसलिए कि मालिके निसाब पर हर साल अपने नाम से कुर्बानी वाजिब है। (फतावा फैजे रसूल)
देहात में दसवीं जिलहिज्जा को सुबह सादिक के बाद ही से कुर्बानी करना जायज है लेकिन मुस्तहब यह है कि सूरज तुलू होने के बाद करें। (फतावा आलमगीरी)
रात में कुर्बानी करना मकरूह है। (फतावा फैजे रसूल)
शहर के आदमी को कुर्बानी का जानवर देहात में भेज कर नमाज ईद से पहले कुर्बानी करा कर गोश्त को शहर में मंगवा लेना जायज है। (बहारे शरीयत)
कुर्बानी का चमड़ा या गोश्त या इसमें से कोई चीज जब्ह करने वाले कसाब को मेहनताने के तौर पर देना जायज नहीं। (फतावा रजविया)
शहर में नमाजे ईदुल अज्हा से पहले कुर्बानी करना जायज नहीं है। (बहारे शरीयत)
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कुर्बानी करने का तरीका
जानवर को बायें पहलू पर इस तरह लिटाये कि किब्ला को उसका मुंह हो और अपना दाहिना पांव उसके पहलू पर रख कर जल्द जिब्ह करें। अलबत्ता जिब्ह से पहले यह दुआ पढें- ‘‘ इन्नी वज्जहतु वजहिय लिल्लजी फ़तरस्समावाति वल अरज़ हनीफव व मा अना मिनल मुशारिकीन. इन्न सलाती व नुसुकी व महयाय व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन लाशरीक लहु व बिजालि क उमिरतु व अना मिनल मुस्लिम अल्लाहुम्म मिन क व ल क’’ फिर ‘‘बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर’’ पढ. कर जब्ह करे फिर यह दुआ पढे. ‘‘ अल्लाहुम्म तक़ब्बल मिन्नी कमा तक़ब्बल त मिन खलीलि क इब्राहीम अलैहिस्सलाम व हबीबि क मुहम्मदिन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम’’
अगर कुर्बानी अपनी तरफ से हो तो ‘‘मिन्नी’’ और अगर दूसरों की तरफ से हो तो ‘‘मिन्नी’’ के बजाए ‘‘मिन’’ कह कर उसका नाम लें। और अगर बड़े जानवर भैंस वगैरह की कुर्बानी कर रहे है तो फलां की जगह सब शरीकों का नाम लें अगर दूसरे से जब्ह कराएं तो खुद भी हाजिर रहे।
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मुस्ताहाबात
जिसके जिम्मे कुर्बानी है उसके लिए बेहतर है कि चांद रात से बाल न बनवाएं न नाखून तरशवाएं, दसवीं जिलहिज्जा को नमाज से पहले कुछ न खायें, साफ सुथरे या नये कपड़े हसबे इसतात पहने खुश्बू लगाये, ईदगाह को तक्बीरे तशरीक बाआवाजें बुलंद कहता हुआ एक रास्ते से जायें और दूसरे रास्ते से वापस आयें।
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तकसीमे गोश्त व खाल
कुर्बानी का गोश्त काफिर को न दिया जाये। चर्म कुर्बानी या गोश्त वगैरह जिब्ह करने वाले को बतैार उजरत देना जायज नहीं। बेहतर यह है कि कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से कर लें। एक हिस्सा फुकरा और मशाकीन , एक हिस्सा दोस्त व अहबाब और एक अपने अहलो अयाल के लिए रख छोड़े। अगर घर के लोग ज्यादा हो तो सब गोश्त रख सकते है और सदका भी कर सकते है। और बेहतर बांटना ही है। अगर जानवर में कई लोग शरीक हो तो सारा गोश्त तौल कर तक्सीम किया जाये। अंदाज से नहीं। अगर किसी को ज्यादा गोश्त चला गया तो माफ करने से भी माफ नहीं होगा। कुर्बानी की खाल सदका कर दें या किसी दीनी मदरसें को दे।
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कुर्बानी का वक्त
जिलहिज्जा की 10,11,12 तारीख कुर्बानी के लिए मख्सूस दिन है। मगर पहला दिन अफजल है। देहात में 10 जिलहिज्जा की तुलू फज्र के बाद ही से कुर्बानी हो सकती है मगर बेहतर यह है कि तुलू आफताब के बाद कुर्बानी की जाये। शहर मं नमाजें ईद से पहले कुर्बानी नहीं हो सकती। कुर्बानी दिन में करनी चाहिए। दरमियानी रातों में जिब्ह करना मकरूह है।
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जानवरों में शिरकत
भेड़, बकरी, दुम्बा सिर्फ एक आदमी की तरफ से एक जानवर होना चाहिए और भैंस, ऊंट में सात आदमी शिरकत कर सकते है।
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ईदुल अज्हा की नमाज का तरीका
नियत की मैंने दो रकात नमाज ईदुलअजहा वाजिब मय जायद छः तकबीरों के वास्ते अल्लाह तआला के मुहं मेरा काबा शरीफ की तरफ पीछे इस इमाम के अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बांध ले और सना पढ़ें। दूसरी और तीसरी मरर्तबा अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ कानों तक ले जायें फिर छोड़ दे। चैथी मर्तबा तकबीर कहकर हाथ कानों तक ले जायें फिर बांध लें। अब इमाम के साथ रकात पूरी करे। दूसरी रकात में कीरत के बाद तीन मर्तबा तकबीर कहता हुआ हाथ कानों तक ले जायें और हाथ छोड़ दे चैथी मर्तबा बगैर हाथ उठायें तकबीर कहता हुआ रूकूअ में जाये और नमाज पूरी कर लें, बाद नमाज इमाम खुत्बा पढ़े और जुम्ला हाजिरीन खामोशी के साथ सुने खुत्बा सुनना वाजिब है। जिन मुकतादियों तक आवाज न पहंचती हो उन्हें भी चुप रहना वाजिब है बाद दुआ मांगे फिर बाद दुआ इजहारे मर्शरत के लिए मुसाफा व मुआनका करना बेहतर है।
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तकबीरे तशरीक
नवीं जिलहिज्जा के फज्र की नमाज से तेरहवीं के असर तक हर फर्ज नमाज के बाद जो जमात से अदा की गई तो एक मरतबा तकबीरे तशरीक ‘‘ अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर ला इलाहा इल्लल्लाह वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द’
बुलंद आवाज से कहना वाजिब है और तीन बार अफजल है।
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इस दिन रोजा रखना मना
इस्लाम में दो ईदें है। ईद उल फित्र व ईद उल अजहा। ईदुल अजहा बेहद खास है। इस दिन रोजा रखना हराम है। क्योकि यह दिन मेहमान नवाजी का है। यह हजरत इब्राहीम की सुन्नत है। जिसे खुदा ने इस उम्मत के लिए बाकी रखा।
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कुर्बानी के जानवारों की आवक
कुर्बानी के जानवर की आवक बढ़ी है। 25 सितम्बर को ईदुल अज्हा है। व्यवसाायियों द्वारा कुर्बानी का जानवर विभिन्न जगहों पर लगने वाली मार्केट से आवक किया गया।
खलीलाबाद सोमवार को
बहराइच रविवार को
बाराबंकी शनिवार को
चैरीचैरा शानिवार को
फैजाबाद गुरूवार को
कालपी मंगलवार को
अल्लाहपुर गुरूवार को
फतेहपुर सिकरी गुरूवार को
हुजूरपुर गुरूवार को
सहित आसपासके जिलों से आवक हो रही है।
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गोरखपुर में लगने वाली मार्केट
जामा मस्जिद उर्दू बाजार, शाहमारूफ, खूनीपुर, जबहखाना, रेती रोड, मदीना मस्जिद, तुर्कमानपुर, चक्सा हुसैन पाकीजा होटल खुनीपूर, अस्करगंज, जाफराबाजार, रसूलपूर, इलाहीबाग, गोरखनाथ, दीवान बाजार, गाजीरौजा ऊंचवा में जानवरों की मार्केट लगती है। इसके अलावा दूरदराज के गांवों से लोग जानवर बेचने के लिये आते है।
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महंगाई का दिखा साफ असर
महंगाई का असर कुर्बानी के जानवरों पर साफ तौर पर नजर आ रहा है। इस बार जानवरों में एक हजार से पंद्रह सौ रूपये तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी है। छः हजार से लेकर बीस हजार तक के जानवर बाजार में उपलब्ध है। अब की बार मार्केट में ज्यादा तर गांव देहात के लोग जानवर ला रहे है।व्यापारी अभी समय का इंतेजार कर रहे है। कुर्बानी के चंद दिन बचे हुये है इस दौरान कुर्बानी के जानवर अधिक संख्या में मार्केट मंे उपलब्ध हो जायेगे। कुर्बानी के जानवरों के महंगे होने की वजह से मध्यम वर्गीय परिवारों को दिक्कतें आ रही है। जानवरों की कीमतें बढ़ा कर ली जा रही है। पिछले बार लगभग सत्तर हजार कुर्बानी के जानवरों की बिक्री हुई थी । इस बार यह आकड़ा पार हो जाने की उम्मीद है। कुर्बानी के एक दिन पहले जानवरों के दामों में गिरावट होने की उम्मीद है। बड़े जानवरों में एक हिस्से के लिये 1700 से 2500 रूपया पेशगी के तौर पर लिया जा रहा है।
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ईदुल अज्हा की नमाज का वक्त
कादरिया मस्जिद नखास चैक प्रातः 6.30 बजे
गाजी मस्जिद गाजी रौजा, प्रातः 7.30 बजे
ईदगाह सेहरा बाले का मैदान, प्रातः 9ः00 बजे
ईदगाह मुबारक खां शहीद, प्रातः 8ः00 बजे
ईदगाह बेनीगंज, प्रातः 9ः00 बजे
ईदगाह इमामाबाड़ा स्टेट, प्रातः 8ः00 बजे
ईदगाह चिलमापुर, प्रातः 7ः30 बजे
ईदगाह पुलिस लाइन, प्रातः 8ः30 बजे
शाही जामा मस्जिद उर्दू बाजार, प्रात 8ः30 बजे
जामा मस्जिद पुराना गोरखपुर, प्रातः 8ः00 बजे
जामा मस्जिद रसूलपुर, प्रातः 8ः30 बजे






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