नौ लाख बरस का अजाब
जहां रोजा रखने के बेशुमार फजाइल हैं। वहीं बगैर किसी सही मजबूरी के रमजानुल मुबारक का रोजा तर्क करने पर सख्त सजायें भी है। रमजान शरीफ का एक रोजा जो बिला किसी उज्रे शरई के जान बूझकर छोड़ दे तो एक हदीस के मुताबिक उसे नौ लाख बरस जहन्नम की आग में जलना पड़ेगा। नीज जिसने एक रोजा जाया कर दिया तो अब उम्र भर भी अगर रोजे रखता रहे तब भी उस छोड़े हुए रोजे की फजीलत नहीं पा सकता। पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम फरमाते हैं कि जिसने रमजान के एक दिन का रोजा बगैर रुखसत बगैर मर्ज रमजान के एक दिन का अफ्तार किया तो जमाना भर का रोजा उसकी कजा नहीं हो सकता। अगरचे बाद में रख भी ले। यानी वो फजीलत जो रमजानुल मुबारक में रोजा रखने की थी। अब किसी तरह नहीं पा सकता। लिहाजा हमें हरगिज हरगिज गफलत का शिकार होकर रोजे जैसी अजीमुश्शान नेमत नहीं छोड़नी चाहिए। कुछ लोग रोजा रखकर बगैर सही मजबूरी के रोजा तोड़ डालते हैं वो इस हदीस को बार-बार पढ़ें और अल्लाह के कहर व गजब से खूब डरें। पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने फरमाया कि मैं सोया हुआ था तो ख्वाब में दो शख्स मेरे पास आए और मुझे एक दुश्वार गुजार पहाड़ पर ले गए। जब मैं पहाड़ के दरमियानी हिस्से पर पहुंचा तो वहां बड़ी सख्त आवाजें आ रही थीं। तो मैंने कहा कि ये कैसी आवाजें हैं? तो मुझे बताया गया कि ये जहन्नमियों की आवाजें हैं। फिर मुझे और आगे ले जाया गया मैं कुछ ऐसे लोगों के पास से गुजरा कि उनको उनके टख्नों की रगों में बांधकर उल्टा लटकाया गया था। उनके गलफडे़ फाड़ दिए गए थे और उनके गलफड़ों से खून बह रहा था तो मैंने पछा कि ये कौन लोग हैं? तो मझे बताया गया कि ये लोग रोजा रखकर अफ्तार से पहले बिना मजबूरी के खा पी लेते थे।
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