रिपोर्ट: रशाद लारी / फ़ैयाज़ अहमद
गोरखपुर। यह कहानी सिर्फ एक सड़क हादसे की नहीं है। यह एक ऐसे पिता की बेबसी की कहानी है, जिसकी 11 साल की बेटी अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी और मौत के बीच जूझ रही है और बेटी की सांसें बचाने की कोशिश में पिता की सारी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि घर में खाने के पैसे नहीं बचे और पिता के मुताबिक उसने पिछले दो दिनों से खाना तक नहीं खाया।
2 अगस्त को खजनी थाना क्षेत्र के उनवल गांव में शरीयत अली की 11 वर्षीय बेटी आबिदा सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गई। हादसे के बाद परिजन उसे जिला अस्पताल गोरखपुर लेकर पहुंचे। हालत गंभीर होने पर बच्ची को बीआरडी मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया। वहां करीब एक दिन इलाज के बाद उसे गोरखपुर के ट्रांसपोर्ट नगर स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां तब से उसका इलाज चल रहा है।
बेटी की ज़िंदगी बचाने की उम्मीद में शरीयत अली ने अब तक दो लाख रुपये से अधिक खर्च कर दिए हैं। जो कुछ जमा था, वह इलाज में चला गया। रिश्तेदारों और परिचितों से भी मदद और कर्ज लेने की कोशिश की, लेकिन अब वहां से भी हाथ खड़े हो चुके हैं।
आज हालात यह हैं कि एक तरफ अस्पताल का बढ़ता बिल है और दूसरी तरफ अस्पताल के बिस्तर पर ज़िंदगी के लिए संघर्ष करती 11 साल की आबिदा।
शरीयत अली का कहना है कि उनके पास सरकार द्वारा जारी आयुष्मान कार्ड है, लेकिन ट्रांसपोर्ट नगर स्थित निजी अस्पताल ने कार्ड स्वीकार करने से इनकार कर दिया। परिवार के मुताबिक अस्पताल की ओर से कहा गया कि वहां आयुष्मान योजना का लाभ नहीं मिलता।
यहीं से कई गंभीर सवाल सामने आते हैं—अगर कोई गरीब परिवार आयुष्मान योजना का पात्र है, तो उसे इलाज का लाभ दिलाने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या किसी गरीब परिवार के लिए आयुष्मान कार्ड केवल एक कार्ड बनकर रह जाएगा? और यदि संबंधित अस्पताल योजना के दायरे में नहीं है, तो ऐसे परिवार को तत्काल वैकल्पिक सरकारी या योजना से जुड़े अस्पताल तक पहुंचाने की व्यवस्था कौन करेगा?
शरीयत अली की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। बेटी अस्पताल में ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रही थी और पिता को हादसे के मामले में पुलिस कार्रवाई के लिए भी भटकना पड़ा।
शरीयत अली के मुताबिक, खजनी पुलिस ने शुरुआत में मुकदमा दर्ज नहीं किया। इसके बाद उन्होंने एसएसपी डॉ. कौस्तुभ से मुलाकात की। उनका कहना है कि एसएसपी ने मामले पर नाराज़गी जताते हुए मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए।
यानी एक तरफ अस्पताल का खर्च जुटाने की जद्दोजहद, दूसरी तरफ बेटी की चिंता और तीसरी तरफ न्याय के लिए पुलिस अधिकारियों के चक्कर—एक गरीब पिता आखिर कितनी लड़ाइयां अकेले लड़े?
शरीयत अली का यह भी आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने उनकी मोटरसाइकिल अपने कब्जे में ले ली है और पैसे लेकर आने को कहा जा रहा है। हालांकि इन आरोपों पर अस्पताल प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
सबसे दर्दनाक तस्वीर अस्पताल के कमरे से बाहर दिखाई देती है। वहां एक पिता अपनी बेटी की ज़िंदगी बचाने के लिए हर दरवाज़ा खटखटा रहा है। उसकी जमा पूंजी खत्म हो चुकी है। उधार की गुंजाइश खत्म हो चुकी है। घर में खाने तक के पैसे नहीं हैं। लेकिन बेटी की उम्मीद अभी बाकी है।
यह मामला सिर्फ एक परिवार की आर्थिक मजबूरी नहीं, बल्कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़े कई सवालों को भी सामने लाता है। आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद यदि गरीब परिवार इलाज के लिए परेशान है, तो योजना की जमीनी पहुंच की जांच जरूरी है। साथ ही निजी अस्पताल में इलाज, कथित बकाया राशि, मोटरसाइकिल को कब्जे में रखने और पुलिस कार्रवाई से जुड़े आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग तत्काल इस मामले का संज्ञान लें। बच्ची आबिदा के इलाज की स्थिति की जांच हो, आयुष्मान कार्ड की पात्रता और उसके इस्तेमाल की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जाए तथा परिवार को सरकारी स्तर पर हर संभव मदद उपलब्ध कराई जाए।
क्योंकि इस वक्त सवाल सिर्फ एक अस्पताल के बिल का नहीं है।
सवाल एक 11 साल की बच्ची की ज़िंदगी का है।
और उस पिता का भी, जो अपनी बेटी को बचाने के लिए अपना सबकुछ हार चुका है—लेकिन फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ी है।
शरीयत अली का मोबाइल नंबर— 9695824498

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