दीवारों दर के बोसे लूंगा मचल-मचल के।
देखूंगा उनका रौजा आंखें मसल-मसल के।।
तैबा से दूर रह कर गर दफन हो गया मैं।
अर्शे बरीं से गुजरे महबूबे किब्रिया जब।
आईं सलामी देने हूरें निकल-निकल के।।
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू। मैं सैयद फ़रहान अहमद हूँ। इस ब्लॉग के माध्यम से इस्लामी जानकारी, सीरतुन्नबी ﷺ, कुरआन व हदीस की शिक्षाएँ, इतिहास, शिक्षा तथा सामाजिक विषयों पर प्रमाणिक और उपयोगी लेख साझा करता हूँ। हमारा उद्देश्य ज्ञान को सरल भाषा में अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना है।
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