बड़ा बे अदब हूं...!


14, सितंबर 2026 मुर्शिद ए गिरामी *मौलाना अहमद रज़ा नक्शबंदी कमालपुरी* (खुदा ए पाक इन्हें सलामत रखे) का उर्स हज़रत मुहम्मद अली बहादुर शाह रहमतुल्लाह तआला अलैह के सिलसिले में रहमतनगर, गोरखपुर आना हुआ। 
हुआ कुछ यूं कि अचानक जनाब अली गज़नफर शाह साहब की दिल की दुनिया में निगाह ने अपना काम किया और तय शुदा मुकर्रिर साहब को कैंसिल करके हज़रत को बुला लेने का शौक दिल में डाल दिया गया। एक गुलाम और नौकर के लिए इससे बढ़कर खुश किस्मती क्या हो कि अल्लाह वालों की ज़ियाफत का मौका हाथ लग जाये।
                  हमने हर मुमकिन महाज़ पर कोशिश की कि हज़रत ए आली जाह हम निकम्मों की दावत क़ुबूल कर लें। और सखी का करम निकम्मों पर ही अपने रहमत की बरखा बरसाता है। हमने हज़ार एहतमाम से अपने बड़े हज़रत के निहायत अज़ीज़ खलीफा डॉ मुफ्ती खालिद अय्यूब मिस्बाही शीरानी साहब से दिल की हसरत का इज़हार किया। हज़रत की ज़र्रा नवाज़ी कि आपने मुर्शिदजान के पास जाकर मोहतरम हाजी अली रज़ा साहब के साथ मुर्शिद ए  करीम को इस करम के लिए राज़ी कर लिया। और यूं कहें कि उन्होंने ही राज़ में बात रखते हुए इस बहाने से हम निकम्मों को नवाज़ दिया। 
                  बस हमारी ताकत जो थी वो हम करते रहे और आज वो घड़ी भी आंखों ने देखी कि मुर्शिद ए गिरामी गोरखपुर की ज़मीन पर पहली बार किसी जलसे में शिरकत के लिए बाकायदा तशरीफ लाए। हम कथनी के लोग मुर्शिद की शान के लायक कुछ न कर सके बहुत सी गलतियों पर हम अपने आपको जवाब नहीं दे सकते लेकिन अल्लाह वाले नवाज़ने आए थे और नवाज़ कर चले गए। 
                  शाम 05 बजे के करीब मुर्शिदजान का आना हुआ। सब्ज़पोश हाउस मस्जिद, जाफरा बाज़ार में हज़रत का क़याम हुआ। और फिर जो कुछ हुआ वो सब ज़ाहिर के तमाशे हैं बाकी जो बातिन की बातें हैं वो अलग। हमने मखलूक को आपकी तरफ लपकते अपनी खुली आंखों से देखा है। दूर जाने की कोशिश करने वालों को भी करीब खींच के नवाज़ा गया।
                  आज उर्स ए अली बहादुर शाह रहमतुल्लाह तआला अलैह के स्टेज पर जब हज़रत की आमद हुई आप तशरीफ फरमा हुए। सोफे पर न बैठ कर नीचे बैठना पसंद फरमाया। स्टेज की जिम्मेदारी होने के नाते पहली बार हज़रत के रूबरू कुछ कहने की गुस्ताखी की। हम महबूब के होते हुए दूसरों से मुखातिब होने के मुजरिम ठहरे। खुदा हमें माफ फरमाए।
                  और इस जुर्म पर नवाज़ा कुछ यूं गया कि मुर्शिदजान ने अपनी बातिनी तवज्जो से वो करम किया कि बयान से बाहर। दिल की दुनिया में जो हलचल और हरकत बपा थी वो बस देने वाले का रब और देने वाला ही जानता है। बाकी सब कुछ तो राज़ ही रहे लेकिन ये राज़ ज़रूर खुल जाना चाहिए कि हमारा काम बस टूट कर अल्लाह वालों से प्यार करना है, खुद को फना कर देना इस रास्ते की पहली मंज़िल ठहरी। बाकि काम अल्लाह पाक के हुक्म से अल्लाह वाले देख लेते हैं।
                  लेकिन ये चाहना कहने सुनने में जितना आसान है करने में उतना ही पेचीदा। लेकिन उसकी मर्ज़ी है वो जिस दिल को चाहे तड़पने का शऊर और तौफीक अता फरमा दे। बहर हाल बहुत सी बातें कहने सुनने की नहीं होतीं बस अल्लाह वालों से लगे रहें उनके दर पर सरेंडर कर देना ही फाइनल कामयाबी को हासिल करने का इकलौता रास्ता है। इसके सिवा ये रास्ता तय हो पाना आदतन नामुमकिन है।
भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी।
बड़ा बे अदब हूं सज़ा चाहता हूं।।
मुर्शिद का नौकर
मुहम्मद अनस क़ादरी नक्शबंदी 
गोरखपुर उप्र।

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