- 3 जुलाई 1857 की घटना को इतिहास में उचित स्थान दिलाने की पहल, संग्रहालय में संरक्षित हैं क्रांति से जुड़े दस्तावेज और अवशेष
बस्ती। बहादुरपुर ब्लॉक क्षेत्र में मनोरमा नदी के तट पर स्थित महुआ डाबर आज भले ही खंडहरों और वीरान पड़े अवशेषों के रूप में दिखाई देता हो, लेकिन स्थानीय इतिहास और उपलब्ध अभिलेखों में यह स्थल 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार 3 जुलाई 1857 को यहां ब्रिटिश सेना ने व्यापक दमनात्मक कार्रवाई की थी। गांव को तीन ओर से घेरकर बड़ी संख्या में लोगों की हत्या और पूरे गांव को आग के हवाले किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्थानीय परंपराओं में इस घटना में मृतकों की संख्या पांच हजार से अधिक बताई जाती है।
महुआ डाबर की पहचान केवल 1857 की त्रासदी से नहीं, बल्कि उसके समृद्ध अतीत से भी जुड़ी है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार वर्ष 1813 में डॉ. फ्रांसिस बुकानन के सर्वेक्षण में महुआ डाबर एक बसे-बसाए कस्बे के रूप में दर्ज था। करीब 200 घरों वाले इस कस्बे में सूती वस्त्र, छींट, रेशम, मलमल, कपड़ों की रंगाई, अनाज और पीतल का कारोबार होता था। मनोरमा नदी के किनारे स्थित होने के कारण यह क्षेत्र व्यापारिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था।
- अंग्रेजी कार्रवाई के बाद बना ‘गैरचिरागी’- स्थानीय ऐतिहासिक अभिलेखों में उल्लेख है कि 1857 के विद्रोह के बाद महुआ डाबर और आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रशासन ने कठोर दमनात्मक कार्रवाई की। बाद के ब्रिटिश अभिलेखों में महुआ डाबर को ‘गैरचिरागी’ गांव के रूप में दर्ज किए जाने की बात कही जाती है, अर्थात ऐसा गांव जहां दोबारा आबादी नहीं बस सकी।
इसी दौर में क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह भी हुआ। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार फैजाबाद से दानापुर की ओर जा रहे छह अंग्रेज अधिकारियों को स्थानीय क्रांतिकारियों ने मार गिराया था। इसके बाद ब्रिटिश प्रशासन ने महुआ डाबर और आसपास के इलाकों में व्यापक कार्रवाई की। गिरफ्तारियों और लोगों को फांसी दिए जाने का उल्लेख भी विभिन्न स्थानीय ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है।
महुआ डाबर के क्रांतिकारी इतिहास से जुड़े प्रमुख नामों में जमींदार जफर अली का नाम भी लिया जाता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्हें गिरफ्तार कर मृत्युदंड दिया गया। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी उनकी फांसी की सजा बरकरार रहने का उल्लेख मिलता है।
- 1999 में शुरू हुई इतिहास बचाने की मुहिम
महुआ डाबर की शहादत और क्रांतिकारी इतिहास को संरक्षित करने के उद्देश्य से उनके वंशजों ने वर्ष 1999 में महुआ डाबर संग्रहालय की स्थापना की। संग्रहालय में 1857 से जुड़े पत्र, हथियार, जले हुए अवशेष, समाचार पत्र-पत्रिकाएं, तस्वीरें, सिक्के, ऐतिहासिक दस्तावेज, पुस्तकें तथा मुकदमों से संबंधित अभिलेख संरक्षित किए गए हैं।
संग्रहालय के निदेशक डॉ. शाह आलम राना का कहना है कि महुआ डाबर को अब राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए सरकार को ठोस पहल करनी चाहिए। उनका कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम के इस महत्वपूर्ण स्थल को लंबे समय तक अपेक्षित पहचान और सरकारी संरक्षण नहीं मिल सका है।
उन्होंने सरकार से प्रस्तावित करीब दस एकड़ क्षेत्र में राष्ट्रीय स्मारक और शहादत कॉरिडोर विकसित करने की मांग की है। साथ ही संग्रहालय को सरकारी संरक्षण देने, ऐतिहासिक दस्तावेजों और सामग्री का डिजिटलीकरण कराने तथा महुआ डाबर को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान देने की मांग उठाई है।
- पाठ्य पुस्तकों में शामिल हो महुआ डाबर का इतिहास
डॉ. राना ने यूपी बोर्ड और NCERT की कक्षा 6 से 12 तक की इतिहास की पुस्तकों में महुआ डाबर और 1857 के स्थानीय स्वतंत्रता संग्राम को स्थान देने की मांग की है। उनका कहना है कि नई पीढ़ी को अपने स्थानीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में क्षेत्र के योगदान की जानकारी मिलनी चाहिए।
उन्होंने 3 जुलाई को महुआ डाबर के शहीदों की स्मृति में राष्ट्रीय स्मृति दिवस घोषित करने पर विचार करने, स्कूल-कॉलेजों में विशेष कार्यक्रम आयोजित करने और विद्यार्थियों के लिए महुआ डाबर का शैक्षणिक भ्रमण शुरू कराने की भी मांग की है।
इसके अलावा 1857 के दौरान हुई ब्रिटिश कार्रवाई के लिए ब्रिटेन सरकार से ऐतिहासिक खेद और माफी की मांग, विदेशों में संरक्षित महुआ डाबर से संबंधित ऐतिहासिक धरोहरों की पहचान कर उन्हें भारत वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास तथा उस दौर के उपलब्ध अभिलेखों का अध्ययन किए जाने की मांग भी उठाई गई है।
- प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से स्थल पर पहुंचने की अपील
डॉ. शाह आलम राना ने प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से महुआ डाबर पहुंचकर मनोरमा नदी के तट पर स्थित क्रांति स्थल पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने की अपील की है। उन्होंने बेहतर सड़क संपर्क उपलब्ध कराने और महुआ डाबर को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान देने की मांग भी की है।
उनका कहना है कि महुआ डाबर केवल एक उजड़ा हुआ गांव नहीं, बल्कि 1857 की उस सामूहिक चेतना का प्रतीक है जिसमें हिंदू और मुस्लिमों ने मिलकर औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध किया था।
डॉ. राना ने कहा कि यदि देश जलियांवाला बाग जैसे स्थलों को राष्ट्रीय स्मृति में स्थान दे सकता है, तो 1857 में तबाह किए गए महुआ डाबर की शहादत को भी राष्ट्रीय पहचान मिलनी चाहिए। उनके अनुसार महुआ डाबर के शहीदों की कहानी को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना केवल स्थानीय लोगों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।








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