नदी ने घड़े को क्या सिखाया


 एक कुम्हार नदी के किनारे मिट्टी के घड़े बेचता था। उसके बनाए घड़े सुंदर और मजबूत होते थे।


एक दिन उसने एक नया घड़ा बनाया। उसे बहुत गर्व था कि यह घड़ा बाकी घड़ों से बेहतर है।


वह घड़ा नदी के किनारे रखा था। पास बहती नदी को देखकर घड़ा मन ही मन सोचने लगा, "मैं कितना सुंदर हूँ और नदी कितनी साधारण। नदी में तो बस पानी ही पानी है।"


अचानक घड़े के पास एक बच्चा आया। उसने घड़ा उठाया और उसमें नदी का पानी भर दिया।


घड़े ने सोचा, "अब पानी मेरे अंदर है। मैं नदी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हूँ।"


कुछ दूर जाकर बच्चे ने पानी पी लिया।


घड़ा खाली हो गया।


वह उदास हो गया।


तभी नदी की आवाज जैसे उसके भीतर गूँजी, "तुम दुखी क्यों हो?"


घड़े ने कहा, "मैं खाली हो गया हूँ।"


नदी ने कहा, "तुम कभी भरे थे ही नहीं। जो पानी तुम्हारे अंदर था, वह मेरा था।"


घड़ा चुप रहा।


नदी ने कहा, "तुम्हारा काम पानी को अपना समझना नहीं, उसे सुरक्षित रखना है। जब कोई प्यासा आए तो उसे दे देना।"


घड़े ने पूछा, "तो मेरी अपनी कोई कीमत नहीं?"


नदी बोली, "तुम्हारी कीमत पानी के मालिक होने में नहीं, किसी की प्यास बुझाने में है।"


घड़ा पहली बार अपनी भूमिका समझा।


कुछ दिनों बाद वही घड़ा एक मुसाफिर के हाथ में था। मुसाफिर ने उससे पानी पिया और आगे बढ़ गया।


घड़े को खुशी हुई।


उसे समझ आ गया कि खाली होना हमेशा नुकसान नहीं होता। कभी-कभी खाली होना ही किसी दूसरे को भरने का रास्ता बनता है।


कुम्हार ने देखा कि उसका घड़ा लोगों के काम आ रहा है। उसने उसे बेचने के बजाय अपने घर में रख लिया।


वह घड़ा वर्षों तक पानी भरने और प्यासे लोगों की सेवा करने के काम आता रहा।


एक दिन कुम्हार का बेटा बोला, "अब यह घड़ा पुराना हो गया है। इसे फेंक क्यों नहीं देते?"


कुम्हार ने कहा, "पुराना वह नहीं जो मिट्टी का हो गया है। पुराना वह है जिसका दिल किसी के काम न आए। यह घड़ा आज भी किसी की प्यास बुझा सकता है।"


सीख: हमारी कीमत इस बात से नहीं तय होती कि हमारे पास कितना है, बल्कि इस बात से होती है कि हम अपने पास मौजूद चीज से दूसरों के कितने काम आ सकते हैं। कभी-कभी खाली होना भी सेवा का हिस्सा होता है।

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