बाँसुरी की पुकार


 


एक बार एक बाँसुरी बनाने वाले ने नदी के किनारे उगे बाँस को काटा। उसने बाँस को साफ किया, उसके अंदर के हिस्से को खाली किया और उसमें कई छेद कर दिए। फिर उसने उसे एक सुंदर बाँसुरी का रूप दे दिया।

जब पहली बार किसी ने उसे बजाया तो उससे ऐसी आवाज निकली कि सुनने वालों के दिल भर आए। किसी को उसमें खुशी सुनाई दी, किसी को दुख और किसी को जुदाई का दर्द।

एक बच्चे ने पूछा, “यह बाँसुरी इतनी उदास आवाज क्यों निकालती है?”

बुज़ुर्ग ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि यह अपने उस जंगल से अलग हो चुकी है जहाँ कभी यह दूसरे बाँसों के बीच खड़ी थी। इसकी आवाज उसी जुदाई की कहानी है।”

बच्चा बोला, “लेकिन अब तो यह बहुत सुंदर बन गई है।”

बुज़ुर्ग ने कहा, “सुंदर बनने के लिए इसे अपने पुराने रूप से गुजरना पड़ा। इसके अंदर से सब कुछ निकाल दिया गया, फिर इसमें छेद किए गए। अगर यह अपने पुराने रूप को ही पकड़े रहती तो कभी संगीत पैदा न कर पाती।”

मौलाना रूमी की शिक्षा यही समझाती है कि इंसान के दिल में भी एक अजीब बेचैनी होती है। वह दुनिया की बहुत-सी चीजें हासिल कर ले, फिर भी उसके अंदर एक खालीपन रह सकता है। यह खालीपन उसे अपने असली स्रोत की तरफ लौटने की पुकार देता है।

इंसान जब अपने अहंकार, लालच और गलत इच्छाओं को कम करता है तो उसका दिल भी बाँसुरी की तरह बन जाता है—खाली, नरम और दूसरों के लिए मधुर।

सीख: कभी-कभी दिल की बेचैनी हमें अपने असली उद्देश्य की ओर बुलाती है।

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