बहुत मुश्किल है अध्यापक का अध्यापक होना!


पिछले दिनों बल्कि कल ही मेरा दो मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों के एडमिशन के सिलसिले में अपने ही शहर (गोरखपुर, उप्र।) के एक इंटर कॉलेज में जाना हुआ। एडमिशन फॉर्म तो मैं अपने साथी आसिफ महमूद सर के साथ एक दिन पहले ही उन बच्चों की खातिर हासिल कर चुका था। उसकी पूर्ति भी तकरीबन मुकम्मल थी। डॉक्युमेंट्स भी साथ मुनसलिक कर दिए थे। 

कॉलेज क्लर्क ने एक अध्यापक का नाम बताते हुए बताया कि मुझे इन साहब से मिलना होगा। स्टाफ रूम की जानिब अपने साथी हाफिज़ रहमत अली साहब व उन दो बच्चों के साथ गया तो एक जानने वाले टीचर से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि फलां साहब अभी इबादत/पूजा/अर्चना के लिए गए हुए हैं। उन मुलाकाती टीचर साहब से उनका नंबर लिया और उनसे रुखसती ले ली। 

वक़्त तो लगना ही था कि साहब इबादत/पूजा/अर्चना के लिए गए हुए थे लिहाज़ा साथी हाफिज़ रहमत साहब को वहां छोड़ कर मैं चल दिया कि अपनी तहरीक का एक काम कर आऊं। बहरहाल कुछ देर में ही वापस आ गया। मालूम हुआ कि इबादतगुज़ार की इबादत अब तक पूरी न हो सकी है। शायद वो अपने पिछले पापों के प्रायश्चित के लिए कोशिश कर रहे थे (जैसा कि उनके ही साथ पढ़ाने वाले मेरे एक मुलाकाती टीचर साहब ने बताया)। 

मेरे साथी हाफिज़ रहमत साहब नमाज़ पढ़ाने की खातिर अपनी मस्जिद पर चले गए और मैं उन बच्चों को लिए साहब के इंतज़ार में बहुत खुशदिली के साथ खड़ा था कि आज शायद एक अच्छे व पढ़े लिखे आदमी से मुलाकात करके एक नई ऊर्जा मिलेगी। कुछ नया सीख पाऊंगा। 

साहब आए तो मैं उनके पास बहुत अदब से गया और कहा : "ये एडमिशन फॉर्म ले लीजिए।" इतना कहना था कि साहब मुझ पर भड़क उठे। क्या? कैसे? क्यूं? और बहुत ही बेतुके रवैये में मुझसे गुफ्तगू करने लगे। शायद उन्हें अपने सरकारी नौकर होने का घमंड था या ये समझ बैठे थे कि हाफिज़ मौलाना की कमज़ोरी का फायदा उठाते हुए अपना फ्रस्टेशन यहीं निकाल लेते हैं। कोई आखिर मेरा कर ही क्या पाएगा?

शायद ज़रूर उनका गुमान सच था कि नौकर होने का घमंड तो होना ही चाहिए। और कमज़ोरों को दबाना और पढ़ने का शौक लेकर आने वाले बच्चों या गार्जियन के साथ ऐसा सुलूक करना ही नौकरों को ज़ेब देता है। शराफत और नर्मी तो गैर पढ़े लिखे व गरीब लोगों का काम है। 

बहरहाल....साहब से मैं कहता रहा कि मेरी बात तो सुन लीजिए। लेकिन ये सबक तो उन्हें पढ़ाया ही नहीं गया था न ही उनकी शराफत को ये किसी भी तरह गवारा हो सकता था। बात सुन लेने से शायद वो अनपढ़ या गरीब व कमज़ोर साबित हो जाते। साहब मुझे लेकर स्टाफ रूम में गए और वहां चंद और पढ़े लिखे व मज़बूत लोगों ने (जो उसी कॉलेज के स्टाफ में से थे) उनका हाथ बंटाया। अपने इल्म से मुझे और उन बच्चों को नीचा दिखाने की भरपूर कोशिश की। मैंने ज़िक्र किया कि मैं कल आपके मैनेजर साहब से मिलकर आया हूं आपके प्रिंसिपल साहब से मेरी बात हुई है। तो साहब लोग रिलैक्स मोड पर आए। 

लेकिन ऐ पढ़े लिखे अध्यापक साहिबान आपने मेरे दिमाग़ में बहुत सारी उलझनें पैदा कर दी हैं। अगर आपकी पढ़ाई या आपकी ताकत इसका जवाब दे सकती है तो मुझे जवाब ज़रूर इनायत फरमाइएगा। हम सारी ज़िंदगी आपका शुक्र अदा करेंगे। 

• क्या सारे पढ़े लिखे नौकर ऐसे ही होते हैं? अगर हां तो मेरी गुज़ारिश है कि कुछ लोगों को अनपढ़ ही छोड़ दिया जाए। ताकि इंसानियत का दर्द समझने वाला कोई तो हो। कोई तो हो जो हम जैसे कमजोरों को गले लगा ले और हमारी बातें सुन ले। यकीन मानिए आप तो पढ़े लिखे, अमीर और ताकतवर हैं लेकिन इंसानियत के भले के लिए सिर्फ ये चीज़ें काफी नहीं है। अगर आपको ये फलसफा न समझ आए तो बिला झिझक मुझसे राब्ता कर लीजिएगा मैं आपकी तरह ताकतवर और पढ़ा लिखा तो नहीं हूं लेकिन मैंने जिसका कलमा पढ़ा है न उनके अख्लाक बड़े प्यारे हैं। लिहाज़ा मैं कोशिश करूंगा कि आपके सामने बड़ी मुहब्बत से लबकुशाई कर सकूं। 

• क्या लोगों के न पढ़ने लिखने की वजह सिर्फ गुर्बत, उनकी लापरवाही या वगैरह वगैरह है? या कहीं न कहीं पढ़े लिखे लोगों का अख्लाक और रवैया भी उन्हें अनपढ़ रहने पर मजबूर कर रहा है? इस सवाल का हल आप तन्हाई में बैठ कर खुद अपने आपसे पूछ सकते हैं। अगर अल्लाह पाक ने चाहा तो हल ज़रूर मिल जाएगा।

• क्या एक अध्यापक के अध्यापक होने के लिए सिर्फ डिग्री, पैसा और ताकत ही काफी है? या अध्यापक का अध्यापक होना इन सबसे आगे कुछ और बातों पर डिपेंड करता है? 

(किसी की डिग्निटी और रैपोटेशन पर असर न पड़े इसलिए इस तहरीर में कॉलेज और अध्यापक का नाम नहीं लिखा गया है। साथ ही शब्दों के चुनाव में भी बहुत एहतियात बरता गया है। पढ़ने वाले नोट कर लें कि ये दिल भी अनपढ़ और कमज़ोर लोगों के पास ही है। पढ़े लिखे और ताकतवर लोग तो इस बुराई से पाक हैं।) 

एक कमज़ोर सी आवाज़ ~ मुहम्मद अनस, गोरखपुर उप्र।


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