بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
اللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّعَلٰى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَّبَارِكْ وَسَلِّمْ
صَلَّى اللّٰهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَآلِهِ وَسَلَّمَ
अल्लाह तआला ने इंसानों की हिदायत के लिए बहुत से अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम को दुनिया में भेजा। हर नबी ने अपनी उम्मत को अल्लाह की वहदानियत, नेक रास्ते और अच्छे अख़लाक़ की तरफ बुलाया। इन तमाम पैग़ंबरों में हमारे प्यारे आका, रहमतुल्लिल-आलमीन, ख़ातिमुन्नबिय्यीन, हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम का मकाम सबसे बुलंद और सबसे आला है।
आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम सिर्फ अरब के लोगों के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए रहमत, नबी व रसूल बनाकर भेजे गए। आपकी ज़िंदगी तमाम इंसानों के लिए एक मुकम्मल नमूना (आइडियल-आदर्श) है। आपकी मक्की ज़िंदगी खास तौर पर सब्र, सच्चाई, अमानत, दावत, बहादुरी, रहमदिली और अल्लाह पर पूरा भरोसा रखने का बेहतरीन उदाहरण है।
मक्का मुकर्रमा की ज़मीन वह मुकद्दस जगह है जहाँ हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की पैदाइश हुई, जहाँ आपने अपना मुबारक बचपन और जवानी गुजारी, जहाँ से ऐलाने नुबूवत हुआ और जहाँ आपको तरह-तरह की परेशानियों और तकलीफों का सामना करना पड़ा।
आप ﷺ की ज़िंदगी को मुख्य रूप से मक्की और मदनी दौर में समझा जाता है। मक्की दौर वह महान अध्याय है जिसमें नबी-ए-करीम ﷺ ने तौहीद का पैग़ाम पहुंचाया, लोगों को शिर्क और बुराइयों से बचने की दावत दी, कमजोर और सताए गए मुसलमानों को सब्र की शिक्षा दी और अत्याचारों के बावजूद अल्लाह के दीन की तब्लीग जारी रखी।
ध्यान रहे “मक्की ज़िंदगी” से मुराद केवल ऐलाने नुबूवत के बाद के 13 वर्ष नहीं, बल्कि विलादत-ए-मुबारक से लेकर हिजरत-ए-मदीना तक के 53 वर्ष हैं।
इसलिए मक्की ज़िंदगी का अध्ययन करने वाले उम्मीदवारों को केवल ऐलाने नुबूवत के बाद के संघर्षों को नहीं, बल्कि आपके मुबारक बचपन, जवानी, व्यापार, निकाह, सामाजिक प्रतिष्ठा, काबा की तामीर के समय आपके निर्णय, ऐलाने नुबूवत से पहले के पाकीज़ा किरदार और फिर ऐलाने नुबूवत के बाद की दावत व कुर्बानियों को भी समझना चाहिए।
मक्का मुकर्रमा का माहौल
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की पैदाइश से पहले अरब का समाज बहुत-सी बुराइयों में घिरा हुआ था। इस दौर को आम तौर पर दौर-ए-जाहिलियत कहा जाता है। जाहिलियत का मतलब सिर्फ अनपढ़ होना नहीं है, बल्कि सही अक़ीदे, सही सोच और सही अख़लाक़ से दूर होना भी है।
मक्का में काबा शरीफ मौजूद था, जिसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से बनाया था। मगर बाद के दौर में लोगों ने काबा के आसपास बहुत से बुत रख दिए थे और उनमें से कई लोग बुतों की पूजा करने लगे थे।
अरब के समाज में शराब पीना, जुआ खेलना, बदला लेना, कबीलों की लड़ाई, गरीबों और कमजोरों पर ज्यादती जैसी अनेक बुराइयाँ फैली हुई थीं। ताकतवर व्यक्ति को अक्सर कमजोर पर अपनी ताकत चलाने में कोई झिझक नहीं होती थी।
औरतों की हालत भी कई जगह बहुत खराब थी। कुछ लोग बेटियों की पैदाइश को अपने लिए शर्म समझते थे और बच्चियों को जिंदा दफ़न करने तक की क्रूरता करते थे। बेवाओं के साथ बुरा सुलूक किया जाता था। औरतों को पांव की जूती समझा जाता था।
कर्ज़दार और गरीब लोग भी कई बार शक्तिशाली लोगों के अत्याचार का शिकार होते थे। गुलामों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था। इंसान की इज्जत का पैमाना अक्सर उसका कबीला, धन और ताकत बन गया था।
कबीलों के बीच छोटी-छोटी बातों पर दुश्मनी पैदा हो जाती और लड़ाइयाँ वर्षों तक चलती रहती थीं। बदले की भावना इतनी मजबूत थी कि एक व्यक्ति के अपराध का बदला कभी-कभी दूसरे निर्दोष लोगों से लिया जाता था। ऐसे माहौल में एक ऐसे नबी की जरूरत थी जो लोगों को अंधेरे से निकालकर ईमान, इंसाफ, इंसानियत और अच्छे अख़लाक़ की रोशनी में ले आए।
नबी-ए-करीम ﷺ की पैदाइश और मुबारक नसब
हज़ूर पुरनूर ﷺ का मुबारक नाम मुहम्मद ﷺ है। आप ﷺ कुरैश के प्रतिष्ठित ख़ानदान बनी हाशिम से ताल्लुक रखते हैं। आपका नसब हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब से होता हुआ हाशिम तक पहुंचता है। हमारे प्यारे आका हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की विलादत मक्का मुकर्रमा में 12 रबीउल अव्वल शरीफ़ को हुई। आपकी पैदाइश आमुल-फ़ील वाकिया के 55 दिन बाद हुई। आपके वालिद का नाम हज़रत अब्दुल्लाह रदियल्लाहु तआला अन्हु और वालिदा का नाम हज़रत आमिना रदियल्लाहु तआला अन्हा है।
आप ﷺ के वालिद हज़रत अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु का इंतकाल आपकी विलादत से पहले ही हो चुका था। आपने बचपन में ही यतीमी का दर्द देखा, लेकिन अल्लाह तआला ने अपनी विशेष निगहबानी में रखा और दुनिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार किया। यह बात हमारे लिए बड़ा सबक है कि अल्लाह तआला अपने प्यारे बंदों को मुश्किल हालात में भी अपनी रहमत और हिफाजत में रखता है।
आप ﷺ की उम्र जब लगभग छह वर्ष थी तो आपकी वालिदा हज़रत आमिना رضي الله عنها का इंतकाल अबवा नामक स्थान पर हुआ। इसके बाद आपके दादा हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने आपकी परवरिश की। लगभग आठ वर्ष की उम्र में दादा का भी इंतकाल हो गया और फिर आपके चचा अबू तालिब ने आपकी देखभाल की।
अरब में उस समय यह रिवाज था कि शहर के बच्चों को देहाती इलाकों में दूध पिलाने वाली औरतों के पास भेजा जाता था ताकि बच्चे खुले और साफ वातावरण में पलें और शुद्ध अरबी भाषा सीखें।
हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम को हज़रत हलीमा सादिया रदियल्लाहु तआला अन्हा ने दूध पिलाया। आपके आने से उनके घर में बरकतों का सिलसिला दिखाई देने लगा।यह हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की बरकत और अल्लाह तआला की खास रहमत का एक ख़ूबसूरत पहलू है।
मुबारक बचपन, युवावस्था और बेहतरीन अख़लाक़
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम बचपन से ही दूसरों से अलग और पाकीज़ा थे। आपकी ज़िंदगी में झूठ, धोखा, बदअख़लाक़ी और बुरी आदतों का कोई स्थान नहीं था। आपकी सच्चाई इतनी मशहूर थी कि ऐलाने नुबूवत से पहले ही मक्का के लोग आपको “अल-अमीन” और “अस-सादिक”यानी अमानतदार और भरोसेमंद कहते थे।
यह बहुत बड़ी बात थी। जिस समाज में तरह-तरह की बुराइयाँ फैली हुई थीं, उसी समाज ने हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम को अमीन और सादिक माना। इससे हमें पता चलता है कि किसी इंसान की असली पहचान उसके अच्छे अख़लाक़ और उसके चरित्र से होती है।
यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है कि जिस व्यक्ति को बाद में मक्का के कुछ लोग नबी मानने से इंकार कर रहे थे, उसी व्यक्ति की सच्चाई और अमानत पर वे स्वयं भरोसा करते थे। इससे पता चलता है कि नबी-ए-करीम ﷺ का किरदार ऐलाने नुबूवत से पहले भी अत्यंत पाकीज़ा था।
नबी-ए-करीम ﷺ की पूरी ज़िंदगी सच्चाई, पाकीज़गी और अमानतदारी से रोशन थी। आप ﷺ ने युवावस्था में व्यापार किया। आपकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार ने लोगों के दिलों में आपके लिए भरोसा पैदा किया। यही पाकीज़ा किरदार बाद में आपकी नुबूवत की दावत की सबसे बड़ी व्यावहारिक ताकत बना। आप ﷺ की सीरत से यह बात स्पष्ट होती है कि महान मिशन की शुरुआत महान चरित्र से होती है।
हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा से निकाह
जब हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम जवानी की उम्र को पहुँचे तो आपकी सच्चाई, अमानतदारी और अच्छे कारोबार की वजह से आपकी शोहरत और बढ़ी। हज़रत ख़दीजतुल कुबरा रदियल्लाहु तआला अन्हा एक बहुत सम्मानित और पाकीज़ा खातून थीं। उन्होंने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम के बेहतरीन अख़लाक़ और सच्चाई को देखकर निकाह का रिश्ता पसंद किया।
निकाह के वक्त नबी-ए-करीम ﷺ की उम्र करीब 25 वर्ष व हज़रत ख़दीजा की उम्र करीब चालीस वर्ष थी। हज़रत ख़दीजा बेवा थीं। उस दौर में बेवा से निकाह करके नबी-ए-करीम ﷺ ने औरतों को इज़्ज़त से नवाजा।
निकाह के बाद हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने हर मुश्किल समय में नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम का साथ दिया। बाद में जब नुबूवत का ऐलान हुआ और परेशानियाँ बढ़ीं, तब भी हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने हिम्मत और वफ़ादारी के साथ आपका साथ दिया। हज़रत ख़दीजा رضي الله عنها आपकी जिंदगी की पहली और अत्यंत महान बीवी थीं। ऐलाने नुबूवत के बाद जब सबसे कठिन समय आया तो उन्होंने नबी-ए-करीम ﷺ का साथ दिया और आपकी तस्दीक की।
ऐलाने नुबूवत से पहले काबा शरीफ़ की तामीर का काम हुआ। जब हजर-ए-अस्वद को उसकी जगह रखने का समय आया तो कबीलों के बीच यह सवाल पैदा हो गया कि यह सम्मान किसे मिलेगा। विवाद बढ़ने की स्थिति में नबी-ए-करीम ﷺ को निर्णायक बनाने पर सहमति हुई। आप ﷺ ने एक चादर मंगाई, हजर-ए-अस्वद को उसमें रखा और विभिन्न कबीलों के सरदारों को चादर के किनारे उठाने के लिए कहा। फिर आप ﷺ ने अपने मुबारक हाथों से उसे उसकी जगह रख दिया। इस घटना से आपकी बुद्धिमत्ता, न्यायप्रियता और विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने की क्षमता स्पष्ट होती है।
गारे हिरा और ऐलाने नुबूवत
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम को शुरू से ही तन्हाई और अल्लाह की इबादत पसंद थी। आप मक्का से कुछ दूरी पर मौजूद गारे हिरा में जाकर इबादत और गौर-ओ-फिक्र करते थे। जब आपकी मुबारक उम्र चालीस वर्ष हुई तो गारे हिरा में आप पर अल्लाह तआला की वह्य का नाज़िल होना शुरू हुआ। यहीं से नुबूवत के उस महान मिशन का आगाज़ हुआ जिसने पूरी दुनिया का इतिहास बदल दिया।
आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने लोगों को सबसे पहले अल्लाह की वहदानियत और सही ईमान की तरफ बुलाया। आपकी दावत का मकसद इंसानों को बुतों की गुलामी से निकालकर एक अल्लाह की इबादत की तरफ लाना, झूठ और धोखे से बचाना, गरीबों और कमजोरों के साथ अच्छा व्यवहार करना और इंसान को बेहतर इंसान बनाना था।
सबसे पहले ईमान लाने वाले
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की दावत को सबसे पहले स्वीकार करने वालों में हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा थीं। हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रदियल्लाहु तआला अन्हु, हज़रत अली रदियल्लाहु तआला अन्हु और हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रदियल्लाहु तआला अन्हुम जैसे महान लोगों ने भी इस्लाम की दावत को स्वीकार किया। इन सहाबा-ए-किराम ने बाद में इस्लाम के लिए बड़ी कुर्बानियाँ दीं। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه ने अनेक लोगों तक इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाया और कई बड़े सहाबा उनके माध्यम से इस्लाम के करीब आए। अहले-सुन्नत दृष्टिकोण में इन सहाबा-ए-किराम رضي الله عنهم का विशेष सम्मान है और नबी-ए-करीम ﷺ की संगत में ईमान लाने वाली इस पहली जमात को इस्लाम के इतिहास में अत्यंत ऊंचा स्थान प्राप्त है।
दावत का शुरुआती दौर और मक्का के लोगों की मुखालफत
शुरुआती वर्षों में दावत का सिलसिला हिकमत के साथ आगे बढ़ा। मक्का में मुसलमानों की संख्या बढ़ने लगी। दावत और तरबियत के लिए हज़रत अरकम رضي الله عنه का घर महत्वपूर्ण केंद्र बना। इस दौर में नबी-ए-करीम ﷺ अपने साथियों को ईमान, तौहीद, अखलाक और आखिरत की तैयारी की शिक्षा देते रहे। यहां से यह सबक मिलता है कि किसी बड़े परिवर्तन के लिए केवल संख्या नहीं, बल्कि मजबूत ईमान और सही तरबियत जरूरी होती है। मक्की जीवन के शुरुआती समय में दावत का एक चरण ऐसा था जिसमें नबी-ए-करीम ﷺ ने चुनिंदा लोगों को हिकमत के साथ इस्लाम की दावत दी।
खुले तौर पर दावत
इसके बाद अल्लाह तआला के हुक्म से खुले तौर पर दावत का सिलसिला शुरू हुआ। करीब तीन वर्ष के शुरुआती दौर के बाद नबी-ए-करीम ﷺ ने खुले तौर पर दावत-ए-इस्लाम देनी शुरु की। माउंट सफा से आपने कुरैश को संबोधित किया और उन्हें अल्लाह की ओर बुलाया। आप ﷺ का पैगाम साफ था - अल्लाह एक है, उसी की इबादत की जाए, शिर्क से बचा जाए, झूठ और अत्याचार छोड़ा जाए, गरीबों और कमजोरों के अधिकार अदा किए जाएं और इंसान अपने पैदा करने वाले के सामने जवाबदेही को याद रखे। यहां से हमें एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि इस्लाम की दावत में हिकमत, सब्र और हालात की समझ बहुत महत्वपूर्ण है।
जब नबी-ए-करीम ﷺ ने खुले तौर पर इस्लाम की दावत दी तो आपने लोगों को सबसे पहले तौहीद की ओर बुलाया। आप ﷺ ने फरमाया कि अल्लाह एक है, उसके सिवा कोई माबूद नहीं। इंसान को अपने पैदा करने वाले की इबादत करनी चाहिए और अपने जीवन को अल्लाह की मर्ज़ी के मुताबिक गुजारना चाहिए। आप ﷺ ने झूठ, बेईमानी, ज़ुल्म, चोरी, शराब, जुआ, सूद, अत्याचार और तमाम बुराइयों से बचने की शिक्षा दी तथा सच्चाई, अमानत, रिश्तेदारी, पड़ोसी के अधिकार, गरीबों की मदद और इंसाफ का पैग़ाम दिया।
नबी-ए-करीम ﷺ ने अपने करीबी रिश्तेदारों और मक्का के लोगों तक अल्लाह का पैग़ाम पहुंचाया। आपने अपनी दावत में रिश्तेदारी का लिहाज़ रखते हुए भी सत्य को नहीं छिपाया।
जब नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने खुले तौर पर इस्लाम की दावत देना शुरू किया तो मक्का के कई सरदारों ने इसका विरोध किया। उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि इस्लाम इंसान को अल्लाह के सामने बराबर बताता था। वह गरीब और अमीर, गुलाम और आजाद, कमजोर और ताकतवर सबके साथ इंसाफ की शिक्षा देता था। मक्का के कुछ प्रभावशाली लोगों को डर था कि अगर लोग इस्लाम स्वीकार कर लेंगे तो उनके पुराने सामाजिक और आर्थिक हित खत्म हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम और आपके सहाबा पर तरह-तरह के अत्याचार शुरू कर दिए। लेकिन नबी-ए-करीम ﷺ ने किसी दबाव के कारण अपनी दावत नहीं छोड़ी।
काफ़िरों की मुखालफत और मुसलमानों पर ज़ुल्म
जैसे-जैसे इस्लाम फैलता गया, कुरैश की मुखालफत बढ़ती गई। पहले मज़ाक उड़ाया गया, फिर इल्ज़ाम लगाए गए और बाद में मुसलमानों को शारीरिक तथा सामाजिक यातनाएं दी जाने लगीं। मक्की दौर में विरोध, तिरस्कार, झूठे आरोप और उत्पीड़न का सिलसिला तेज हुआ। कमजोर मुसलमानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। हज़रत बिलाल رضي الله عنه जैसे सहाबा ने अत्याचार सहकर भी ईमान नहीं छोड़ा। यह मक्की जीवन का सबसे बड़ा संदेश है कि सच्चे ईमान वाले व्यक्ति के लिए कठिनाइयां रास्ता रोकने वाली नहीं, बल्कि उसके ईमान की परीक्षा होती हैं।
मुसलमानों को यातनाएँ दी गईं। किसी को गर्म रेत पर लिटाया गया, किसी को मारा गया, किसी को सामाजिक रूप से अलग किया गया और किसी पर आर्थिक दबाव डाला गया। हज़रत बिलाल रदियल्लाहु तआला अन्हु को भी बहुत यातनाएँ दी गईं। मगर उनका ईमान कमजोर नहीं हुआ। हज़रत सुमैया रदियल्लाहु तआला अन्हा और उनके परिवार ने भी इस्लाम के लिए बड़ी तकलीफें उठाईं। हज़रत सुमय्या رضي الله عنها को इस्लाम की पहली शहीदा के रूप में याद किया जाता है। इस्लाम के लिए शहादत पाने वालों में हज़रत सुमैया रदियल्लाहु तआला अन्हा का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। इन घटनाओं से हमें मालूम होता है कि शुरुआती मुसलमानों ने अपने ईमान के लिए कितनी बड़ी कुर्बानियाँ दीं। मक्की दौर की ये कुर्बानियां बताती हैं कि इस्लाम कठिन परिस्थितियों में भी सत्य पर डटे रहने का नाम है। इन घटनाओं से मालूम होता है कि इस्लाम की बुनियाद केवल भाषणों पर नहीं बल्कि कुर्बानी, सब्र और इस्तिकामत पर रखी गई थी।
नबी-ए-करीम ﷺ पर ज़ुल्म
हमारे प्यारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम को भी मक्का के विरोधियों ने बहुत तकलीफें पहुँचाईं। आपको ताने दिए गए, रास्ते में परेशान किया गया और आपकी दावत का मजाक उड़ाया गया। लेकिन रहमतुल्लिल-आलमीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने बदले की भावना को अपने दिल में जगह नहीं दी। आपने सब्र किया और लोगों की हिदायत की दुआ करते रहे। यही आपके रहमत वाले चरित्र की सबसे बड़ी पहचान है।
हबशा की पहली हिजरत
जब मक्का में मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ा तो नबी-ए-करीम ﷺ ने कुछ सहाबा को हबशा जाने की अनुमति दी। वहां एक न्यायप्रिय शासक नजाशी का शासन था। मुसलमानों ने वहां शरण ली। हबशा की हिजरत इस बात की मिसाल थी कि इस्लाम इंसान की जान, ईमान और सुरक्षा की हिफाज़त को महत्व देता है। हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब رضي الله عنه ने नजाशी के दरबार में इस्लाम और मुसलमानों की स्थिति के बारे में प्रभावशाली बात रखी। नजाशी ने मुसलमानों को संरक्षण दिया। हबशा की हिजरत मक्की जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इससे पता चलता है कि मुसलमानों की जान और ईमान की हिफाजत महत्वपूर्ण थी और जरूरत के समय सुरक्षित स्थान की ओर जाने की अनुमति दी गई।
मक्की दौर में हज़रत हमज़ा رضي الله عنه और हज़रत उमर फारूक़ رضي الله عنه के इस्लाम लाने से मुसलमानों को विशेष मजबूती मिली। हज़रत उमर رضي الله عنه के इस्लाम लाने के बाद मुसलमानों में आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने अधिक खुले रूप से इबादत और दावत का सिलसिला जारी रखा।
शिअब-ए-अबी तालिब का दौर और सामाजिक बहिष्कार
जब विरोधियों को लगा कि मुसलमानों पर अत्याचार के बावजूद इस्लाम का संदेश फैल रहा है तो उन्होंने बनी हाशिम और उनके समर्थकों के खिलाफ सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का फैसला किया। कुरैश ने बनी हाशिम और नबी-ए-करीम ﷺ के समर्थकों पर सामाजिक और आर्थिक दबाव डालने के लिए बहिष्कार किया। नबी-ए-करीम ﷺ और आपके परिवार तथा समर्थकों ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में समय गुजारा। भूख, आर्थिक तंगी और सामाजिक अलगाव के बावजूद नबी-ए-करीम ﷺ ने अल्लाह के दीन की दावत को नहीं छोड़ी। यह दौर सब्र और इस्तिकामत की महान मिसाल है।लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में रहना पड़ा। भोजन और जरूरी सामान की कमी का सामना करना पड़ा। मगर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम और आपके साथियों ने सब्र किया। यह दौर हमें बताता है कि सच्चे मिशन के रास्ते में कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन अल्लाह पर भरोसा रखने वाला इंसान हिम्मत नहीं हारता।
आमुल-हुज़्न
मक्की जिंदगी का एक बेहद दुखद दौर वह था जब हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा और आपके चचा जनाब अबू तालिब का इंतकाल हुआ।
हज़रत ख़दीजा रदियल्लाहु तआला अन्हा ने हर मुश्किल घड़ी में नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम का साथ दिया था। इसलिए उनका इंतकाल आपके लिए बहुत बड़ा सदमा था। जनाब अबू तालिब ने भी सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर नबी-ए-करीम ﷺ को संरक्षण दिया। इन दोनों दुखद घटनाओं की वजह से उस साल को आमुल-हुज़्न यानी ग़म का साल कहा जाता है। इन दोनों के इंतकाल के बाद नबी-ए-करीम ﷺ के लिए मक्का में कठिनाइयां और बढ़ गईं।
ताइफ़ का सफर
मक्का में लगातार विरोध और परेशानियों के बाद नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ताइफ़ की तरफ गए और वहाँ के लोगों को इस्लाम की दावत दी।
मगर वहाँ भी आपको बहुत तकलीफ़ दी गई। लोगों ने आपके साथ कठोर व्यवहार किया और पत्थर तक मारे गए। आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम घायल हुए। लेकिन इतनी तकलीफ़ के बावजूद आपने बद्दुआ के बजाय उनकी हिदायत की उम्मीद रखी। यह घटना रहमतुल्लिल-आलमीन के सब्र और रहमदिली की महान मिसाल है। ताइफ़ का वाकिया बताता है कि नबी-ए-करीम ﷺ की रहमत केवल अपने मानने वालों के लिए नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के लिए थी।
मेराज शरीफ़ का मुबारक सफर
मक्की जीवन की सबसे महान और ईमान को ताज़ा करने वाली घटनाओं में इसरा और मेराज का विशेष स्थान है। अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ को रात के एक हिस्से में मस्जिद-ए-हराम से मस्जिद-ए-अक्सा तक सफर कराया और फिर आसमानी अजायबात की सैर कराई। अहले-सुन्नत परंपरा में मेराज-ए-मुस्तफ़ा ﷺ को नबी-ए-करीम ﷺ के महान मोजिज़ात में अत्यंत सम्मान के साथ बयान किया जाता है। मक्की ज़िंदगी की महत्वपूर्ण घटनाओं में इसरा और मेराज का मुबारक सफर भी शामिल है। अल्लाह तआला ने अपने प्यारे महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम को अपनी महान निशानियाँ दिखाईं। इस मुबारक सफर में नमाज़ की विशेष अहमियत भी सामने आती है। इसलिए मुसलमान के लिए नमाज़ केवल एक इबादत नहीं, बल्कि अपने अल्लाह से जुड़ने का महान जरिया है।
इस्लाम का पैग़ाम मक्का से बाहर
नबी-ए-करीम ﷺ ने केवल मक्का वालों तक दावत सीमित नहीं रखी। आप ﷺ विभिन्न लोगों और क़बीलों तक इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाते रहे। हज के मौसम में आने वाले क़बीलों से मुलाकात करना और उन्हें अल्लाह की ओर बुलाना आपकी दावत का महत्वपूर्ण हिस्सा था। मदीना शरीफ़ (पुराना नाम यसरिब था) के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया और धीरे-धीरे वहां इस्लाम के लिए एक मजबूत आधार तैयार हुआ।
बैअत-ए-अक़बा
मक्की दौर के अंतिम चरण में मदीना के लोगों ने नबी-ए-करीम ﷺ से बैअत की। पहली और दूसरी बैअत-ए-अक़बा ने इस्लाम के इतिहास में निर्णायक भूमिका निभाई। इन बैअतों के बाद मदीना, जो आगे चलकर मदीनतुन-नबी ﷺ बना, इस्लामी समाज के निर्माण के लिए तैयार हुआ।
मदीना की तरफ हिजरत की तैयारी
मक्का में विरोध लगातार बढ़ता गया। दूसरी तरफ मदीना के कुछ लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया और नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की मदद का वादा किया। धीरे-धीरे मुसलमानों को मदीना की तरफ जाने की इजाजत मिली। आखिरकार नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने भी मक्का से मदीना की तरफ हिजरत फरमाई। मक्की ज़िंदगी का यह अध्याय बहुत कठिनाइयों, सब्र और कुर्बानियों के बाद पूरा हुआ। कुरैश को जब महसूस हुआ कि मुसलमान मदीना में मजबूत आधार बना रहे हैं तो उन्होंने नबी-ए-करीम ﷺ के खिलाफ साज़िश की। लेकिन अल्लाह तआला ने अपने महबूब ﷺ की हिफाज़त फरमाई और आपने हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه के साथ मदीना की ओर हिजरत की। सीरत की प्रमाणिक परंपरा में हिजरत के दौरान रास्ते की योजना, मार्गदर्शक की नियुक्ति और सावधानी जैसे विवरण मिलते हैं, जो यह बताते हैं कि अल्लाह पर भरोसे के साथ दुनियावी असबाब अपनाना भी सुन्नत है। हिजरत केवल एक शहर से दूसरे शहर जाने का नाम नहीं था। यह इस्लाम के इतिहास का एक महान मोड़ था। मक्का में लगभग 53 वर्ष की ज़िंदगी और ऐलाने नुबूवत के बाद के लगभग 13 वर्षों की दावत, सब्र और कुर्बानी के बाद अब इस्लाम के लिए एक नए समाज के निर्माण का दौर शुरू होने वाला था।
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की मक्की ज़िंदगी हमें बहुत से सबक देती है। मक्की जीवन का अध्ययन केवल कॉम्पिटिशन में अंक प्राप्त करने के लिए नहीं होना चाहिए। इसमें हमारी पूरी ज़िंदगी के लिए मार्गदर्शन छिपा है।
पहला सबक तौहीद व ईमान की मजबूती है। नबी-ए-करीम ﷺ ने सबसे पहले लोगों को अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया। हालात चाहे कितने ही मुश्किल क्यों न हों, मुसलमान को अपने ईमान पर कायम रहना चाहिए।
दूसरा सबक सच्चाई है। ऐलाने नुबूवत से पहले भी हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम "अल-अमीन" और "अस-सादिक" के रूप में मशहूर थे।
तीसरा सबक सब्र है। आपके रास्ते में कांटे डाले गए, पत्थर मारे गए, विरोध किया गया और आपके साथियों को सताया गया, लेकिन आपने सब्र का दामन नहीं छोड़ा। मक्की जीवन में नबी-ए-करीम ﷺ और सहाबा ने वर्षों तक कठिनाइयां सहन कीं, मगर सत्य का रास्ता नहीं छोड़ा।
चौथा सबक रहमदिली है। विरोध करने वालों के साथ भी नबी-ए-करीम ﷺ ने रहम और हिकमत का व्यवहार किया। जिन्होंने आपको तकलीफ दी, उनके लिए भी आपने हिदायत की उम्मीद रखी।
पाँचवाँ सबक इंसाफ है। आपने समाज में कमजोरों, गरीबों, अनाथों और जरूरतमंदों के अधिकारों की तरफ ध्यान दिलाया। दावत में हिकमत है। आपने हर व्यक्ति की स्थिति और क्षमता को देखते हुए इस्लाम का पैग़ाम पहुंचाया।
छठा सबक अल्लाह पर पूरा भरोसा रखना। हिजरत के दौरान सावधानी, योजना और मार्गदर्शन का प्रबंध किया गया, जबकि भरोसा अल्लाह पर रहा। इस्लाम केवल कुछ इबादतों का नाम नहीं बल्कि अच्छा इंसान बनने का भी संदेश देता है।
अहले सुन्नत के नुक्ते-नज़र से मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ
अहले-सुन्नत दृष्टिकोण में नबी-ए-करीम ﷺ से मोहब्बत ईमान की बुनियादी भावनाओं में से है। आपकी शान का अदब, आपकी सुन्नत से मोहब्बत और आपकी सीरत पर अमल मुसलमान के लिए गौरव है। अहले-सुन्नत व जमाअत के नुक्ते-नज़र में हुज़ूर नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम से मुहब्बत ईमान का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारे लिए नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम सिर्फ इतिहास की एक महान शख्सियत ही नहीं, बल्कि हमारे दिलों के आका और महबूब हैं।
आपकी सीरत पढ़ने का असल मकसद केवल तारीख़ें याद करना नहीं है। असल मकसद यह है कि हमारे दिल में आपके लिए मुहब्बत बढ़े और हम आपकी सुन्नत और आपके बताए हुए रास्ते पर चलने की कोशिश करें।
अहले-सुन्नत विचारधारा में नबी-ए-करीम ﷺ की सीरत केवल ऐतिहासिक अध्ययन नहीं बल्कि ईमान और मोहब्बत का विषय है। इसलिए निबंध में नबी-ए-करीम ﷺ के नाम के साथ अदब से “सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम” या “ﷺ” लिखना चाहिए।
अहले-सुन्नत के यहां नबी-ए-करीम ﷺ अल्लाह तआला के आख़िरी नबी और तमाम नबियों के सरदार हैं। आपकी शान, आपकी रहमत, आपके मोजिज़ात और आपके उच्चतम अख़लाक को विशेष अदब के साथ बयान किया जाता है।
चौदहवीं सदी हिजरी के मुजद्दिद आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान رحمۃ اللہ علیہ की परंपरा में इश्क़-ए-रसूल ﷺ, अदब-ए-रसूल ﷺ और सुन्नत से मोहब्बत को विशेष महत्व प्राप्त है। इसलिए कॉम्पिटिशन के निबंध में घटनाओं के साथ-साथ यह भी दिखना चाहिए कि मक्की जीवन ने उम्मत को ईमान, सब्र, मोहब्बत और अख़लाक का क्या संदेश दिया। जब कोई व्यक्ति सीरत लिखे या पढ़े तो उसके दिल में अदब, इश्क़ और ताज़ीम का जज़्बा होना चाहिए।
सीरतुन्नबी लिखने वाले उम्मीदवारों के लिए खास हिदायत
सीरतुन्नबी ﷺ कॉम्पिटिशन में भाग लेने वाले उम्मीदवारों को चाहिए कि वे सीरत लिखते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें।
1. नबी-ए-करीम ﷺ का नाम अदब से लिखें
जहाँ भी नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम का नाम आए, पूरे अदब और ताज़ीम के साथ लिखें। सिर्फ नाम लिखकर आगे बढ़ जाना उचित अंदाज़ नहीं है। अपने लेख में बार-बार पूरा दरूद-ओ-सलाम लिखना मुहब्बत और अदब का खूबसूरत तरीका है।
2. भाषा में बेअदबी न हो
सीरत लिखते समय ऐसे शब्दों से बचना चाहिए जो आम लोगों के लिए तो साधारण हों, लेकिन हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की शान के लिहाज से मुनासिब न हों।आपका जिक्र हमेशा सम्मान, विनम्रता और मुहब्बत के साथ किया जाए।
3. घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर न लिखें
सीरत में मुहब्बत जरूरी है, लेकिन मुहब्बत का मतलब यह नहीं कि ऐसी बातें लिख दी जाएँ जिनका भरोसेमंद स्रोत न हो। उम्मीदवारों को चाहिए कि वे सीरत की प्रमाणित किताबों और भरोसेमंद अहले सुन्नत के उलमा की किताबों से जानकारी लें।
4. तारीख़ और घटनाओं में सावधानी रखें
सीरत लिखते समय पैदाइश, ऐलाने नुबूवत, हिजरत और दूसरी घटनाओं के बारे में सही जानकारी लिखने की कोशिश करें। अगर किसी घटना की तारीख़ को लेकर अलग-अलग रिवायतें मिलती हों तो बिना जांचे निश्चित दावा न करें।
5. सहाबा और अहले-बैत का अदब
नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम के सहाबा-ए-किराम, अहले-बैत और उम्महातुल मोमिनीन रदियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन का भी पूरे अदब से जिक्र करें। उनके नाम के साथ उचित सम्मानजनक अल्फाज़ लिखना चाहिए।
6. सीरत का मकसद समझें
सीरत लिखने का उद्देश्य केवल कॉम्पिटिशन जीतना नहीं होना चाहिए। असल मकसद यह होना चाहिए कि हमें अपने प्यारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की ज़िंदगी से कुछ सीख मिले। अगर हम सीरत पढ़कर सच्चे हो जाएँ, नमाज़ के पाबंद बनें, माता-पिता का सम्मान करें, गरीबों की मदद करें, किसी पर जुल्म न करें और अपने अख़लाक़ को बेहतर बनाएं, तो यही सीरत पढ़ने की असली कामयाबी है।
कॉम्पिटिशन में निबंध (Essay) लिखने वाले उम्मीदवारों के लिए विशेष तैयारी -सीरतुन्नबी ﷺ कॉम्पिटिशन में केवल घटनाएं याद कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। उम्मीदवार को घटनाओं का क्रम भी मालूम होना चाहिए।
सबसे पहले यह याद करें: विलादत → हलीमा सादिया رضي الله عنها → वालिदा का इंतकाल → दादा की कफालत → अबू तालिब की कफालत → व्यापार → हज़रत ख़दीजा رضي الله عنها से निकाह → काबा की तामीर और हजर-ए-अस्वद का फैसला → ग़ार-ए-हिरा → पहली वह्य → शुरुआती ईमान लाने वाले → दार-ए-अरकम → खुलेआम दावत → कुरैश की मुखालफत → हबशा की हिजरत → हज़रत हमज़ा और हज़रत उमर رضي الله عنهما का इस्लाम → सामाजिक बहिष्कार → शिअब-ए-अबी तालिब → आमुल-हुज़्न → ताइफ़ → मेराज → मदीना की दावत → बैअत-ए-अक़बा → हिजरत।
इसके साथ उम्मीदवार को हर घटना से एक शिक्षा भी जोड़नी चाहिए। इससे निबंध केवल तारीखों और घटनाओं की सूची नहीं रहेगा बल्कि विचारपूर्ण और प्रभावशाली बनेगा।
खुलासा
पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की मक्की जिंदगी सब्र, सच्चाई, अमानत, रहमत, बहादुरी, हिकमत और अल्लाह पर भरोसे की ऐसी मिसाल है जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।
जिस मक्का में बुतपरस्ती, कबायली घमंड, शराब, जुआ, कमजोरों पर अत्याचार और दूसरी सामाजिक बुराइयाँ फैली हुई थीं, उसी मक्का से हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने तौहीद, इंसाफ, इंसानियत और अच्छे अख़लाक़ का पैग़ाम बुलंद किया।
आप ﷺ ने लोगों को अल्लाह की इबादत की तरफ बुलाया। आप ﷺ ने गरीबों, यतीमों और कमजोरों के अधिकारों की तरफ ध्यान दिलाया। आपने बदले की भावना के बजाय सब्र और रहमत का रास्ता दिखाया।
आप ﷺ की मक्की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि सच्चाई का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन सच्चाई को छोड़ा नहीं जा सकता। मुश्किलें कितनी भी हों, अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
सीरतुन्नबी ﷺ लिखने वाले हर उम्मीदवार को चाहिए कि वह इसे केवल कॉम्पिटिशन का विषय न समझे, बल्कि अपने महबूब नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम की ज़िंदगी को समझने और अपने जीवन को बेहतर बनाने का जरिया बनाए।
हमारे कलम से जब हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम का नाम निकले तो उसमें अदब हो, हमारी बात में ताज़ीम हो, हमारे दिल में मुहब्बत हो और हमारी ज़िंदगी में आपकी सुन्नत की झलक हो।
हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की मक्की ज़िंदगी मानव इतिहास का ऐसा महान अध्याय है जिसमें एक ओर अत्याचार, बहिष्कार, भूख, सामाजिक दबाव और विरोध दिखाई देता है तो दूसरी ओर ईमान, सब्र, हिकमत, रहमत, अख़लाक और अल्लाह पर पूर्ण भरोसे की रोशनी दिखाई देती है।
मक्का की गलियों में शुरू होने वाली यह दावत आगे चलकर पूरी दुनिया के लिए हिदायत का संदेश बनी। जिस नबी ﷺ को अपने ही शहर में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, वही रहमतुल्लिल-आलमीन बनकर पूरी इंसानियत के लिए आदर्श बन गए।
मक्की जीवन हमें सिखाता है कि सच्चाई का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन सत्य को छोड़ना समाधान नहीं। हमें नबी-ए-करीम ﷺ की तरह सब्र, हिकमत, सच्चाई, अमानत और रहमदिली को अपनाना चाहिए।
आज के विद्यार्थियों के लिए मक्की जीवन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सफलता केवल संसाधनों से नहीं मिलती। मजबूत ईमान, ऊंचा चरित्र, निरंतर मेहनत, सही उद्देश्य और कठिन परिस्थितियों में दृढ़ता ही इंसान को महान बनाती है।
इसलिए सीरतुन्नबी ﷺ कॉम्पिटिशन में भाग लेने वाला हर उम्मीदवार केवल यह याद न करे कि कौन-सा वाकिया कब हुआ, बल्कि यह समझने का प्रयास करे कि मेरे प्यारे आका हज़रत मुहम्मद مصطفیٰ ﷺ की मक्की ज़िंदगी मुझे आज क्या सिखाती है। यही सीरत का वास्तविक उद्देश्य है और यही नबी-ए-करीम ﷺ से सच्ची मोहब्बत का तकाज़ा भी है।
अल्लाह तआला हमें अपने प्यारे महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम, सहाबा किराम, अहले बैत, औलिया किराम की सच्ची मुहब्बत, अदब और ताज़ीम अता फरमाए और आपकी सीरत पर चलने की तौफीक अता फरमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन।
(नोट : पूरे लेख में अगर कहीं आपको कुछ भी ग़लती नज़र आए तो फौरन बताएं। मेहरबानी होगी। हम उन गलतियों को तुरंत दूर करेंगे।)

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