- 1857 की जंगे आज़ादी की अज़ीम शख्सियत सरफराज अली की दास्तान
- इतिहास के पन्नों में नहीं मिली इस अज़ीम कुर्बानी को जगह
गोरखपुर।
न दबाया जेरे जमीं उन्हें
न दिया किसी ने कफन उन्हें
न हुआ नसीब वतन उन्हें
न कहीं निशाने मजार है।
मुग़ल बहादुर शाह ज़फ़र का यह शेर आज़ादी के दीवाने क्रांतिकारी मौलवी सरफराज अली पर मौजू है। शहर-ए-गोरखपुर की मिट्टी में 1857 की जंगे आजादी की सैकड़ों ऐसी दास्तानें दफ़न हैं जिन्हें लोग जानते नहीं। एक ऐसी ही दास्तान है क्रांतिकारी सरफराज अली की जिन्होंने अंग्रेज़ी सल्तनत के छक्के छुड़ा दिए थे। अंग्रेज़ मौलवी सरफराज को कभी पकड़ न सके। उनसे जुड़े लोगों पर हजारों जुल्म ढाये। इससे भी जी न भरा तो सैकड़ों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। बे कफ़न उन्हें दफ़ना दिया गया। आज भी उन शहीदों की रूहें मौजूद हैं।
शहर के बाईपास से सटे सौदागार मोहल्ले के पीछे लाल डिग्गी सब स्टेशन के सामने एक बड़ी से टूटी फूटी चहारदीवारी है। यह चहारदीवारी किसी जमाने में राजा बसंत सिंह का किला हुआ करती थी। अंग्रेजी सल्तनत ने इस किले का जेलखाने में बदल दिया। पुरानी जेल के नाम से मशहूर यह जगह अब वीरानियों के आगोश में है। जेल का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। यह जेल एक छोटी बस्ती में बदल चुकी है। इस पुरानी जेल में वतन पर फिदा होने वालों की आरजूएं दफ़न है। आज भी आप का गुजर यहां से होगा तो आपको गुजारे ज़माने के वतन पर मिटने वालों की रूह फिजा में होने का अहसास कराएंगी।
यहीं वह जगह है जहां वतन पर जान न्यौछावर करने वालों को यातनाएं दी जाती थीं। यहीं पर न जाने कितने क्रांतिकारियों ने शहादत पाई। जिसके बारे में ज़माने का मालूम नहीं। यहां पर मौजूद कई सदी से मौजूद पाकड़ का पेड़ उस दौर का गवाह है जब आज़ादी की हसरत रखने वाले यहां पर सजाएं पाते और शहीद किए जाते। पाकड़ का पेड़ 1857 की क्रांति का गवाह है। इस पाकड़ के पेड़ पर करीब तीन सौ लोगों को अंग्रेज़ों ने शहीद किया था। आज भी उन शहीदों की रूह यहां पर अपनी मौजूदगी का अहसास कराती है।
देशप्रेमी मौलवी सरफराज अली की वंशज डा. दरख्शा ताजवर ने उनके ज़िंदगी के बारे में बताया कि सौदागार मोहल्ले के हुसैन बख़्श के पूर्वज अकबर की सेना में ऊंचे पद पर थे। हुसैन बख़्श के लड़के सरफराज अली के दिल में हिंन्दुस्तान के प्रति बेहद मोहब्बत थी।
डॉ. ताजवर ने बताया कि जब हिन्दुस्तान की 1857 की पहली जंगे आज़ादी शुरू हुई तो मौलवी सरफराज भी इसमें कूद पड़े। उन्होंने 1857 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी।
अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। उन्होंने देशवासियों को जंगे आज़ादी में लड़ने का आहवान किया। देश की आज़ादी लिए शाहजहांपुर में लोगों को इक्ट्ठा करने के बाद बरेली जा पहुंचे। जहां सरफराज क्रांतिकारी बख़्त ख़ां के सम्पर्क में आए और अपने साथियों के साथ दिल्ली पहुंचकर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी। दिल्ली में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ क्रांति को तीव्रता प्रदान करने के लिए बख़्त ख़ां ने फतवा भी जारी किया जिसमें मौलवी सरफराज अली के भी हस्ताक्षर थे।
दिल्ली में हार के बाद सरफराज अंग्रेज़ों को चकमा देकर लखनऊ आ गए। यहां उन्होंने बेगम हज़रत महल के साथ लड़ाई में भाग लिया। मगर अपने कुछ लोगों के गद्दारी करने से अंग्रेज़ों को लगातार जीत मिल रही थी। अंग्रेज मौलवी सरफराज को पकड़ कर मौत की सज़ा देना चाहते थे। मगर गोरखपुर का यह क्रांतिकारी हर वक्त अंग्रेज़ों को चकमा देता रहा। अंत में जब लगभग पूरे देश में अंग्रेज़ी हुकूमत हो गई तो भी सरफराज ने हार नहीं मानी और नेपाल में शरण लेकर वहीं से रणनीति बनाने लगे।
आखिर में मौलवी सरफराज अली की मौत भी नेपाल में हुई और उन्हें काठमांडू की जामा मस्जिद के ही एक हिस्से में दफ़न कर दिया गया। हिन्दुस्तान के इस वीर सपूत की आख़िरी आरामगाह पड़ोसी मुल्क नेपाल में है। क्रांतिकारी मौलवी सरफराज अली से ताल्लुक रखने वालों पर अंग्रेजों ने जमकर कहर बरपाया।
क्रांतिकारी सरफराज से अंग्रेज़ इस कदर परेशान थे कि वह हर हालत में उन्हें मौत की सज़ा देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने हर हथकंडे अपना लिए। मगर मौलवी सरफराज अंग्रेज़ी हुकूमत के हाथ नहीं लगे। अंग्रेज़ों ने सौदागार मोहल्ले में जमकर कहर ढाया। मौलवी सरफराज के जानने वाले से लेकर उनका नाम लेने वालों को भी फांसी चढा दिया गया। मौलवी सरफराज के घर से चंद कदम दूर एक राजा का किला है। जिसे अंग्रेज़ों ने अपनी जेल बना रखी थी। अंग्रेज़ों को जब फांसी देने के लिए फांसी घर नहीं मिला तो उन्होंने जेल में लगे एक बड़े पाकड़ के पेड़ से सैकड़ों लोगों को फांसी पर लटका दिया। इस पेड़ पर करीब तीन सौ से अधिक लोगों को फांसी दी गई थी।
दरख्शा ताजवर बताती हैं कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इस बगावत की सजा मौलवी सरफराज अली को अगर देश निकाला से मिली तो उनके परिवार और पड़ोसी भी बच न सके। सरफराज को पकड़ने में नाकाम अंग्रेज़ों ने शक की बुनियाद पर मोहल्ले के अधिकांश लोगों को फांसी की सजा सुना दी।
उन्हें सरफराज के घर से कुछ दूरी पर स्थित जेल के एक पेड़ से लटका कर फांसी दे दी। वहीं उनके खानदानी कब्रिस्तान में दो ऐसी कब्रें हैं जो इस सितम की गवाह हैं जिसे लोग गंजे शहीदां कहते हैं। यहां देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालोें को दफ़न किया गया था। डॉ. दरख्शा ने बताया कि आज भी कुछ रिश्तेदार नेपाल के पोखरभिटवा में बसे हुए हैं।
शहर-ए-गोरखपुर के सौदागार मोहल्ले के मौलवी सरफराज अली की कुर्बानी को न सिर्फ हम भूल गए बल्कि इतिहास के पन्नों में भी न के बराबर जगह मिली। मौलवी सरफराज अली की बहादुरी और अंग्रेज़ों के सितम की पूरी कहानी सौदागार मोहल्ला, 150 साल पुराना पाकड़ का पेड़ और पुरानी जेल बयां कर रही है। कभी मौका मिले तो जाइए कुछ खंडहर अब भी मौजूद हैं पुरानी जेल में।




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