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बोल की लब आज़ाद हैं तेरे
लकड़ी का ताजिया
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गोरखपुर। मियां साहब इमामबाड़ा जहां सोने चांदी ताजिया के लिए प्रसिद्ध है वहीं एक ताजिया ऐसा भी है जो सूफीसंत रोशन अली शाह ने बनवाया था। वह ताजिया आज भी लोगों के आस्था का अहम केंद्र बना हुआ है।
विलादत बा सआदत : सय्यदुल औलिया, रईसुल फुक़्हा, वल मुज्तहदीन, वल मुहद्दिसीन, इमामुल अइम्मा, सिराजुल उम्माह, काशिफ़ुल गुम्मह, इमामे आज़म अबू हनीफा नोमान बिन साबित कूफ़ी रदियल्लाहु तआला अन्हु” आप अस्सी 80 हिजरी में कूफ़ा में पैदा हुए। “नुज़हतुल कारी शरह सहीहुल बुखारी में है कि हज़रत इमामे आज़म अबू हनीफा रदियल्लाहु तआला अन्हु की पैदाइश किस सन में हुई इस बारे में दो क़ौल मशहूर हैं, 70 हिजरी या अस्सी 80 हिजरी ज़्यादातर लोग अस्सी 80 हिजरी को तरजीह देते हैं, लेकिन बहुत से मुहक़्क़िक़ीन ने 70 हिजरी को तरजीह दी है, मुफ़्ती शरीफुल हक़ अमजदी रहमतुल्लाह अलैह के नज़दीक भी यही सही है। आप का नाम : आपका नामे नामी इस्मे गिरामी “नोमान” है, और वालिद का नाम “साबित” और दादा का नाम ज़ूता है, और आप की कुन्नियत “अबू हनीफा” है, आप के पोते हज़रत इस्माईल बिन हम्माद रदियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैं इस्माईल बिन हम्माद बिन नोमान बिन साबित बिन नोमान मर्ज़बान हूँ, हमारे दादा “इमाम अबू हनीफा” अस्सी 80 हिजरी में पैदा हुए, उनके दादा अपने नोमोलूद बेटे साबित को हज़रत सैयदना अली रदियल्लाहु तआला अन्हु की खिदमत में हाज़िर हुए ...
*जब शेख सनाउल्लाह आये राजा को पकड़ने* *राजा चंद्र सेन ने रामगढ़ताल के किनारे दुर्ग (किला) बनवाया था* गोरखपुर-परिक्षेत्र का इतिहास के लेखक डा. दानपाल सिंह लिखते हैं कि मध्यगुम के आरम्भ में रोहिणी व राप्ती नदी के मध्यवर्ती द्वीप स्थल पर डोमिनगढ़ की स्थापना हुई। सन् 1210 - 1226 ई. में राजा चन्द्र सेन ने डोमिनगढ़ राज्य पर विजय प्राप्त की। उस समय तक गोरखपुर शहर नहीं बसा था। डोमिनगढ़ सतासी राज्य का समीपवर्ती एक प्रमुख नगर एवं गढ़ था। राजा चन्द्रसेन ने डोमिनगढ़ पर आक्रमण किया। डोमिनगढ़ का किला बहुत मजबूत और प्राकृतिक साधनों द्वारा पूर्ण सुरक्षित था। डोमकटार पहले से संशाकित थे, उन्होंने पर्याप्त सैनिक तैयारी भी कर ली थी। किले में महीनों खाने-पीने की सामग्री रख ली गयी थी। डोमकटारों ने कई दिनों तक जमकर युद्ध किया। पराजय नजदीक देखकर डोमकटार राजा सुरक्षात्मक मुद्रा में आ गया तथा अपने बचे हुए सैनिकों के साथ किले के अंदर फाटक बंद कर बैठ गया। राजा चन्द्रसेन ने किले को ध्वस्त करने की आज्ञा दे दी। देखते ही देखते सतासी राज के सैनिकों (राजा चन्द्रसेन) ने दुर्गम किले को ध्वस्त कर दिया तथा उसमें छिप...
-आप जकात व सदका-ए-फित्र अदा करेंगे तो गरीब दुआएं देंगे -जकात की रकम हकदार मुसलमानों तक जल्द पहुंचायें -मुकद्दस रमजान का तीसरा रोजा सैयद फरहान अहमद गोरखपुर। मुकद्दस रमजान के शुरु होते ही रब की रहमतें बंदों पर बरस रही हैं। पहले दिन से मौसम खुशगवार बना हुआ हैं। इबादतों का सिलसिला जारी रहा। सहरी व इफ्तार का फैजान बदस्तूर जारी हैं। तंजीम कारवाने अहले सुन्नत के बानी मुफ्ती मोहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि इस्लाम में जकात फर्ज हैं। जकात पर हक मजलूमों, गरीबों, यतीमों, बेवाओं का है। इसे जल्द से जल्द हकदारों तक पहुंचा दें ताकि वह रमजान व ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। जकात फर्ज होने की चंद शर्तें है। मुसलमान अक्ल वाला हो, बालिग हो, माल बकदरे निसाब (मात्रा) का पूरे तौर का मालिक हो। मात्रा का जरुरी माल से ज्यादा होना और किसी के बकाया से फारिग होना, माले तिजारत (बिजनेस) या सोना चांदी होना और माल पर पूरा साल गुजरना जरुरी हैं। सोना-चांदी के निसाब (मात्रा) में सोना की मात्रा साढ़े सात तोला (87 ग्राम 48 मिली ग्राम ) है जिसमें चालीसवां हिस्सा यानी सवा दो माशा...
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