गोरखपुर। मस्जिद गाजी रौजा में जिक्रे शुहदाए कर्बला मजलिस में मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती अख्तर हुसैन ने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने एक अहम खुत्बा हज्जतुल विदा में अर्फा के दिन हजारों सहाबा किराम (पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम के साथी) के सामने बयान फरमाया था जिसे सुनने तिर्मिजी हदीस की मशहूर किताब में रिवायत किया गया है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ऊंट कसवा पर खुत्बा पढ़ रहे थे। आपको फरमाते सुना ऐ लोगों मैंने तुममें वह चीज छोड़ी है कि जब तक तुम उनको थामे रहोगे, गुमराह न होगे। अल्लाह की किताब और मेरी इतरत यानी अहले बैत (पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम के घर वाले)। इस हदीस पाक में भी सरकारे दो आलम ने खुद इरशाद फरमाया कि अगर तुम हिदायत चाहते हो और गुमराही और जलालत से अपने आपको दूर रखना चाहते हो तो अहले बैत का दामन थाम लो, कभी गुमराह नहीं होगे। मस्जिद के पेश इमाम हाफिज रेयाज अहमद ने मजलिस की शुरूआत कुरआन पाक की तिलावत से की तत्पश्चात् नात शरीफ हाफीज रहमत अली ने पेश की। हाफिज रेयाज ने बताया कि एक हदीस मे है कि पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जो शख्स अहले बैत से बुग्ज रखता है वह मुनाफिक है। और इरशाद फरमाया कोई बन्दा मोमिने कामिल नहीं हो सकता यहां तक कि मैं उसको उसकी जान से ज्यादा प्यारा ना हो जाऊं और मेरी औलाद उसको अपनी जान से ज्यादा प्यारी ना हो जाये और मेरे अहले बैत उसको अपने अहल से ज्यादा महबूब न हों और मेरी उम्मत उसको अपनी जात से ज्यादा महबूब ना हो। पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने फरमाया अपनी औलाद को तीन बातें सिखाओ। अपने नबी की उल्फ़त व मुहब्बत। अहले बैत अतहार की उल्फत व मुहब्बत। कुरआने करीम की किऱ्अत। एक और हदीस में इरशाद फरमाया पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम ने कसम है उस जात की जिसके दस्ते कुदरत में मेरी जान है जिसने मेरे अहले बैत से बुग़्ज रखा अल्लाह उसको दोजख में डालेगा। एक जगह इरशाद फरमाया जो लोग हौजे कौसर पर पहले आएंगे वह मेरे अहले बैत होंगे।
जब तक मुसलमानों के हाथों में कुरआन हकीम और अहले बैत अतहार का दामन रहा वह कभी गुमराह और रूसवा नहीं हुए बल्कि हमेशा फतह व कामरानी उनके कदम चूमती रही। लेकिन जैसे ही मुसलमानों ने उन दोनों के दामन से अपनी वाबस्तगी छोड़ी हर जगह जिल्लत व रूसवाई उनके सामने आते चली गयी।
मजलिस में ताबिश सिद्दीकी, दबीर सिद्दीकी, सेराज अहमद, शहबाज अहमद, मोहम्मद जकी, खुर्शीद अहमद, अशरफ राइनी, औंरगजेब सहित तमाम लोग मौजूद रहे।
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