ईद मिलादुन्नबी ﷺ पर अमन के साथ निकाला जाए जुलूस-ए-मुहम्मदी
गोरखपुर। 26 अगस्त को ईद मिलाद-उन-नबी ﷺ यानी बारह रबीउल अव्वल शरीफ़ है। बारह रबीउल अव्वल शरीफ़ को आख़िरी नबी पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम दुनिया में तशरीफ़ लाए।
ईद मिलादुन्नबी ﷺ का मुबारक अवसर पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए खुशी, मोहब्बत, शुक्र और इश्क़-ए-रसूल ﷺ का अवसर है। इस दिन मुसलमान अपने प्यारे आका, रहमतुल्लिल-आलमीन, सरकार-ए-दो आलम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की विलादत-ए-मुबारक की खुशी मनाते हैं। जगह-जगह मिलाद की महफ़िलें सजती हैं, कुरआन-ए-पाक की तिलावत होती है, नात-ए-पाक पढ़ी जाती है, दुरूद ओ सलाम का नज़राना पेश किया जाता है और गरीबों व जरूरतमंदों की मदद की जाती है।
इसी सिलसिले में शहरों और कस्बों में जुलूस-ए-मुहम्मदी ﷺ भी निकाला जाता है। यह जुलूस यदि अदब, एहतराम, अनुशासन, सादगी, शांति और अमन के साथ निकाला जाए तो यह नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत की खुशी के साथ-साथ समाज को भाईचारे, इंसानियत और अच्छे अख़लाक़ का संदेश देने का माध्यम बन सकता है।
इसलिए शहर की तमाम जुलूस कमेटियों, आयोजकों और इसमें शामिल होने वाले लोगों से अपील है कि ईद मिलादुन्नबी ﷺ के मुबारक अवसर पर जुलूस-ए-मुहम्मदी को पूरी तरह शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से निकालें तथा प्रशासन का हर संभव सहयोग करें।
- जुलूस में डीजे और पटाखों से पूरी तरह परहेज करें
जुलूस-ए-मुहम्मदी ﷺ में डीजे, तेज़ आवाज़ वाले साउंड सिस्टम, बैंड-बाजे और ढोल आदि से परहेज किया जाए। जुलूस की पहचान शोर-शराबे से नहीं बल्कि दुरूद ओ सलाम, नात-ए-पाक, सीरत के पैग़ाम और अच्छे अख़लाक़ से होनी चाहिए।
इसी तरह पटाखे, फुलझड़ियां और आतिशबाज़ी भी न की जाए। इससे दुर्घटना का खतरा रहता है, लोगों को परेशानी हो सकती है और कई बार जुलूस का शांतिपूर्ण माहौल भी प्रभावित होता है। ईद मिलादुन्नबी ﷺ की खुशी को ऐसे तरीके से मनाया जाए जिससे किसी भी व्यक्ति को परेशानी या नुकसान न पहुँचे।
- जुलूस में हुड़दंग नहीं, बल्कि अमन और शांति हो
जुलूस-ए-मुहम्मदी ﷺ में किसी भी तरह का हुड़दंग, नारेबाजी के नाम पर अशोभनीय व्यवहार, आपसी झगड़ा, धक्का-मुक्की या विवाद बिल्कुल नहीं होना चाहिए। जुलूस में शामिल हर व्यक्ति यह याद रखे कि वह नबी-ए-करीम ﷺ की विलादत की खुशी में निकला है। हमारे आका ﷺ ने इंसानियत, रहमत, माफ़ी, सब्र और अच्छे अख़लाक़ की शिक्षा दी। इसलिए जुलूस का हर कदम इन्हीं शिक्षाओं की झलक पेश करे।
जुलूस में शामिल लोग राहगीरों, दुकानदारों, बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और मरीजों की सुविधा का ध्यान रखें। रास्ते में किसी को परेशानी न हो और यातायात व्यवस्था प्रभावित न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाए।
- प्रशासन का सहयोग करें
जुलूस के आयोजक प्रशासन द्वारा निर्धारित मार्ग, समय और आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन करें। पुलिस, यातायात विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सहयोग किया जाए।
जुलूस की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए स्वयंसेवकों की टीम बनाई जा सकती है, जो भीड़ को व्यवस्थित रखने, यातायात में सहयोग करने और किसी भी अप्रिय स्थिति को रोकने में मदद करे।
याद रखें, प्रशासन का सहयोग करना किसी तरह से खुशी कम करना नहीं है, बल्कि जिम्मेदार नागरिक होने का प्रमाण है।
- दीनी पोस्टर और मुकद्दस निशानियों का पूरा अदब हो
जुलूस में दीनी पोस्टर, बैनर, झंडे और धार्मिक सामग्री लगाई जाती है। इन सभी का पूरा अदब और एहतराम किया जाना चाहिए। किसी भी दीनी पोस्टर या धार्मिक सामग्री को सड़क पर गिरने, पैरों के नीचे आने या कूड़े में जाने से बचाया जाए।
विशेष रूप से किसी मुकद्दस मकाम या मजार की तस्वीर, जैसे गुंबद-ए-ख़ज़रा की तस्वीर वाले पोस्टर या बैनर की बेअदबी न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाए।
जुलूस समाप्त होने के बाद सभी होर्डिंग्स, बैनर और झंडों को इधर-उधर फेंकने के बजाय सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान पर रख दिया जाए। धार्मिक सामग्री का सम्मान करना हर मुसलमान की जिम्मेदारी है।
- सादगी के साथ इस्लामी लिबास में शामिल हों
जुलूस-ए-मुहम्मदी ﷺ में शामिल होने वाले लोग संभव हो तो साफ-सुथरे और शालीन इस्लामी लिबास में सादगी के साथ शिरकत करें। कपड़ों और पहनावे में दिखावा करने के बजाय अदब और पाकीज़गी को प्राथमिकता दी जाए।
जुलूस की खूबसूरती महंगे कपड़ों, दिखावे और शोर से नहीं बल्कि उसमें शामिल लोगों के अच्छे व्यवहार, चेहरे की शालीनता और दिल में मौजूद इश्क़-ए-रसूल ﷺ से होनी चाहिए।
- विलादत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ अल्लाह की अज़ीम नेमत है
अल्लाह तआला ने इंसान को अनगिनत नेमतों से नवाज़ा है। हम अपने जीवन में अल्लाह की करोड़ों नेमतों का एहसान पूरी तरह बयान नहीं कर सकते। लेकिन जब अल्लाह तआला ने अपने महबूब नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ को मोमिनों के बीच भेजा तो कुरआन-ए-पाक में इसे अपने विशेष एहसान के रूप में बयान फ़रमाया।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है कि उसने मोमिनों पर एहसान फ़रमाया कि उनमें उन्हीं में से एक रसूल भेजा, जो उन्हें उसकी आयतें सुनाते हैं, उन्हें पाक करते हैं और उन्हें किताब व हिकमत की शिक्षा देते हैं।
जब अल्लाह तआला अपने महबूब रसूल ﷺ की तशरीफ़-आवरी को मोमिनों पर अपना एहसान बता रहा है, तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि विलादत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ कितनी अज़ीम और मुबारक नेमत है। इसलिए ईद मिलादुन्नबी ﷺ की खुशी मनाना हमारे लिए सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि अल्लाह की नेमत पर शुक्र और नबी-ए-करीम ﷺ से मोहब्बत के इज़हार का अवसर है।
- मिलाद की खुशी इबादत और नेकियों के साथ मनाएं
ईद मिलादुन्नबी ﷺ के अवसर पर मुसलमान ज्यादा से ज्यादा इबादत करें। कुरआन-ए-पाक की तिलावत करें, दुरूद ओ सलाम का नज़राना पेश करें, नात-ए-पाक पढ़ें और नबी-ए-करीम ﷺ की सीरत को पढ़ें और सुनें। पौधारोपण करें।
मस्जिदों, मदरसों और घरों में मिलाद की महफ़िलें और सीरत के कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ। इन महफ़िलों में नबी ﷺ की रहमत, शफ़क़त, इंसाफ़, सब्र, सच्चाई, अमानतदारी और अच्छे अख़लाक़ का संदेश आम किया जाए।
अगर स्वास्थ्य और परिस्थितियाँ अनुमति दें तो इस मुबारक अवसर पर रोज़ा रखना भी नेक अमल है। विशेष रूप से सोमवार के रोज़े के संबंध में हदीस में नबी ﷺ की विलादत के दिन का उल्लेख मिलता है। इसलिए रोज़ा रखने वाले लोग इसे इबादत और शुक्र के जज़्बे के साथ रखें।
- गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों का ख्याल रखें
मिलादुन्नबी ﷺ की खुशी का एक खूबसूरत पहलू यह भी है कि अपनी खुशी में गरीबों और जरूरतमंदों को शामिल किया जाए। गरीब परिवारों को खाना खिलाया जाए, यतीम बच्चों की मदद की जाए, जरूरतमंदों को कपड़े या आवश्यक सामान दिया जाए और असहाय लोगों की आर्थिक सहायता की जाए।
मरीजों का हालचाल पूछा जाए, बुजुर्गों की सेवा की जाए और पड़ोसियों के अधिकारों का ध्यान रखा जाए। रिश्तेदारों से अच्छे संबंध बनाए जाएँ और जिन लोगों से नाराज़गी है, उनसे सुलह की कोशिश की जाए।
- जुलूस समाज को अमन का संदेश दे
जुलूस-ए-मुहम्मदी ﷺ केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज के सामने अपने आचरण के जरिए नबी ﷺ की शिक्षाओं को पेश करने का अवसर भी है। इसलिए जुलूस में शामिल हर व्यक्ति का व्यवहार ऐसा होना चाहिए जिससे देखने वालों को इस्लाम की शांति, मोहब्बत और इंसानियत का संदेश मिले।
किसी धर्म, समुदाय या व्यक्ति के खिलाफ आपत्तिजनक नारे न लगाए जाएँ। किसी की धार्मिक भावना को ठेस न पहुँचाई जाए। जुलूस में शामिल लोग यह संदेश दें कि हमारे नबी ﷺ रहमत, अमन, इंसाफ़ और हुस्न-ए-अख़लाक़ का पैगाम लेकर आए।
- जुलूस की समाप्ति के बाद भी जिम्मेदारी जारी रहे
जुलूस समाप्त हो जाने के बाद सड़क, चौराहे और सार्वजनिक स्थान गंदे न छोड़े जाएँ। स्वयंसेवक यह सुनिश्चित करें कि जुलूस के कारण कोई कूड़ा-कचरा या धार्मिक सामग्री सड़क पर न रह जाए। सभी झंडे, बैनर और होर्डिंग्स को सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाए। जुलूस के मार्ग को यथासंभव साफ-सुथरा छोड़ना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आइए, इस बार एक मिसाल कायम करें
इस ईद मिलादुन्नबी ﷺ पर हम ऐसी मिसाल कायम करें कि हमारा जुलूस देखकर लोग कहें कि यह नबी-ए-रहमत ﷺ के आशिकों का जुलूस है, जहाँ शोर-शराबा नहीं बल्कि दुरूद ओ सलाम है, हुड़दंग नहीं बल्कि अनुशासन है, नफ़रत नहीं बल्कि मोहब्बत है, गंदगी नहीं बल्कि सफाई है और दूसरों के लिए परेशानी नहीं बल्कि अमन और शांति का पैग़ाम है।
हम अपनी खुशियों को शरीअत के दायरे में रखते हुए मनाएँ, खूब इबादत करें, कुरआन-ए-पाक की तिलावत करें, दुरूद ओ सलाम पढ़ें, मिलाद की महफ़िल सजाएँ, गरीबों और यतीमों को खाना खिलाएँ, मरीजों का हालचाल पूछें, पड़ोसियों का ख्याल रखें और अपने आचरण से पूरी दुनिया को अमन, शांति और हुस्न-ए-अख़लाक़ का संदेश दें।
ईद मिलादुन्नबी ﷺ की खुशी अदब के साथ मनाएँ, जुलूस-ए-मुहम्मदी ﷺ अमन के साथ निकालें और अपने किरदार से इश्क़-ए-रसूल ﷺ का सबूत दें।
अल्लाह तआला हमें अपने महबूब हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की सच्ची मोहब्बत अता फरमाए, आपकी सुन्नतों पर चलने की तौफ़ीक़ दे और ईद मिलादुन्नबी ﷺ की खुशियों को हमारे लिए दुनिया और आख़िरत की कामयाबी का ज़रिया बनाए।
आमीन या रब्बल आलमीन।
1501 सालह मिलाद मनाना है, घर-घर में सीरत पहुंचाना है।

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