सूफी बुजुर्ग अली बहादुर शाह के नाम पर बसा अलीनगर


 

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गोरखपुर। अलीनगर शहर के पुराने व ऐतिहासिक मोहल्ले में शुमार होता है। शहरनामा किताब के मुताबिक यहां सूफी बुजुर्ग अली बहादुर शाह रहते थे। उनकी मजार भी अभी मौजूद है। शहरनामा के मुताबिक 15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मुगलों ने अलीनगर जाफरा बाजार और नियमत चक बसाया। एस.एम. नूरुद्दीन के मुताबिक अलीनगर मोहल्ले में सूफी बुजुर्ग अली बहादुर शाह रहते थे। उन्हीं के नाम पर मोहल्ला अलीनगर है।

वह बताते हैं कि उनके पूर्वज सैयद मीर कटीले सन् 1559 ई. के करीब दिल्ली से आकर गोरखपुर के मौजूदा रेती चौक क्षेत्र में बस गये। सैयद मीर कटीले पांच हजार मुगल फौज के सिपाह सालार थे। मीर कटीले रेती चौक, शेखपुर तथा अलीनगर तक के एक बड़े भू-भाग पर काबिज थे। वहीं गोरखपुर-परिक्षेत्र का इतिहास के लेखक डा. दानपाल सिंह लिखते हैं कि मानवीय गतिविधियों द्वारा अठारहवीं शताब्दी में अलीपुर नगर की स्थापना हुई। सूफी वहीदुल हसन अपनी किताब 'मशायख-ए-गोरखपुर' में लिखते हैं कि हजरत सैयद शाह मारूफ अलैहिर्रहमा के खानदान की एक शाख मोहल्ला अलीनगर में आबाद है। वहां भी बुजुर्गों के मजारात हैं। मियां साहब सैयद अहमद अली शाह अपनी किताब 'महबूबुत तवारीख' में लिखते हैं कि

अलीनगर में एक मर्दे खुदा, वली अल्लाह है मौलवी बाशफा।

वो मारूफी है ये जाने है हम, मशायख घराने के माने हैं हम।

अलीनगर के सबसे पुराने मारुफी खानदान के एडवोकेट नजमुल हक मारुफी ने बताया कि उनके वंशज सैकड़ो सालों से यहां रह रहे हैं। मौलवी मुजीबुल्लाह सन् 1894 में यहां के जमींदार थे। वह म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन व सिविल कोर्ट बॉर एसोशिएसन के दूसरे प्रेसीडेंट  भी थे। इसी तरह खानदान के बकाउल्लाह मुख्तार के पुत्र सफाउल्लाह सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज में थे। उन्होंने नागालैंड में शहादत पाई, वहीं उनकी मजार है। दादा मसूदुल हक भी मशहूर शख्सियत थे। उन्होंने बताया कि पहले यहां मोहर्रम के दिनों में 'मौलवी साहब का जुलूस' निकलता था। जिसकी काफी शोहरत थी। जो अब बंद हो चुका है। मुहर्रम माह में अलीनगर चौराहे पर करीब साठ सालों से ताजमहल जैसी शीशे का ताजिया आकर्षण का केंद्र रहती है। नौवीं एवं दसवीं मुहर्रम के लिए यहां लोगों का मजमा लगा रहता है। इसे पीतल और शीशे के टुकड़ों को जोड़कर बनाया जाता है। मुहर्रम बीतने के बाद ताजिया को फोल्ड कर रख दिया जाता है।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने अलीनगर स्थित बरगद के पेड़ पर आजादी के मतवालों को फांसी पर चढ़ाया। अलीनगर के रहने वाले कृष्ण चंद रस्तोगी के पास ऐतिहासिक सिक्कों व माचिस का शानदार क्लेक्शन था। कुछ समय पहले उनकी मृत्यु हो गई।

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