मियां बाजार स्थित इमामबाड़े की देखभाल सूफी हजरत सैयद रौशन अली शाह करते रहे। वर्ष 1818 ई. में हजरत रौशन अली शाह के शिष्य व भतीजे सैयद अहमद अली शाह इस इमामबाड़े के उत्तराधिकारी हुए। इन्होंने ही मियां साहब की उपाधि धारण की जो शिष्य परम्परा से चली आ रही है। इनके पिता का नाम सैयद औलाद अली था। सैयद रौशन अली शाह ने सैयद अहमद अली शाह की देखभाल अपने जिम्मे ली। बाबा की छत्रछाया में अहमद अली शाह की तरबियत हुई। सैयद अहमद अली ने अपनी मेहनत व सलाहियत से अपने इल्म को निखारा। 17 साल की उम्र में शेरो शायरी शुरू की। उन्होंने उर्दू, अरबी, फारसी तीनों जुबानों में महारत हासिल की। उन्होंने कई किताबें लिखी। पहली किताब ‘कशफुल बगावत’ लिखी जो 1857 ई. के जंगे आजादी पर थी। दूसरी किताब ‘नूरे हकीकत’ लिखी। इसका मौजू मजहब था। तीसरी किताब ‘ महबूब-उत-तवारीख’ लिखी। जिसमें उन्होंने गोरखपुर की तारीख को लिखा। वह बहुत जहीन थे। बाद में उनके उत्तराधिकारी एवं इमामबाड़े के सज्जादानशाीन सैयद वाजिद अली शाह वर्ष 1915 ई. तक सज्जादानशीन रहे। इसके बाद नौ साल की उम्र में ही सैयद जव्वाद अली शाह सज्जादानशीन बने। वह वर्ष 1916 से 1972 ई. तक सज्जादानशीन रहे। इसके बाद बड़े मियां साहब के नाम से मशहूर सैयद मजहर अली शाह वर्ष 1973 से 1986 ई. तक सज्जादानशीन रहे। वर्तमान में सैयद अदनान फर्रूख शाह वर्ष 1987 ई. से अब तक सज्जादानशीन रहे। तीसरी मुहर्रम से सज्जादानशीन की जिम्मेदारी 24 वर्षीय सैयद अयान अली शाह के कांधों पर आ गई है।

0 टिप्पणियाँ