चार मुसाफ़िर लंबी यात्रा कर रहे थे। रास्ते में उन्हें एक सिक्का मिला। चारों बहुत खुश हुए क्योंकि वे कई घंटों से भूखे थे।
पहले आदमी ने कहा, “इससे मैं अंगूर खरीदना चाहता हूँ।”
दूसरा बोला, “मुझे अंगूर नहीं चाहिए। मुझे अनब चाहिए।”
तीसरे ने कहा, “मैं इनब खरीदूँगा।”
चौथा अपनी भाषा में उसी फल का दूसरा नाम लेने लगा।
चारों अपनी-अपनी बात पर अड़ गए। हर व्यक्ति समझ रहा था कि बाकी तीन उसकी इच्छा को नहीं समझते।
बहस इतनी बढ़ी कि चारों एक-दूसरे पर नाराज़ हो गए।
उसी समय वहाँ एक समझदार मुसाफ़िर पहुँचा। उसने उनकी परेशानी पूछी। चारों ने अपनी-अपनी इच्छा बताई।
वह मुस्कुराया और बोला, “तुम चारों अलग चीजें नहीं चाहते। तुम सब एक ही फल चाहते हो, बस उसके नाम अलग-अलग हैं।”
उसने सिक्का लिया और बाजार से अंगूर खरीद लाया। चारों ने अंगूर देखे तो उनकी आँखों में खुशी आ गई।
उन्हें अपनी गलती समझ आई। जिस चीज के लिए वे लड़ रहे थे, वह वास्तव में एक ही थी।
मौलाना रूमी की इस तरह की कथाओं में इंसान को समझाया जाता है कि लोग अक्सर शब्दों, नामों और बाहरी रूपों को लेकर लड़ते रहते हैं, जबकि उनके पीछे छिपी वास्तविक इच्छा एक जैसी हो सकती है।
सीख: केवल शब्दों के अंतर को देखकर झगड़ा नहीं करना चाहिए। समझदारी यह है कि बात के असली अर्थ को समझा जाए।

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