अंग्रेज़ों के ज़माने का है मदरसा अंजुमन इस्लामिया खूनीपुर : 110 साल से दे रहा है दीन की तालीम







गोरखपुर।

शहर-ए-गोरखपुर इल्म व अदब का गहवारा है। मदरसा अंजुमन इस्लामिया से पढ़े लोग दुनिया के हर कोने में इल्म ओ अदब की रोशनी को फैला रहे हैं। दुनिया के जाने माने मऊ के मौलाना हबीबुर्रहमान सहित सैकड़ों मदरसा चलाने वाले मदरसा अंजुमन से पढ़े हैं, जिन्होंने गोरखपुर के आसपास और बिहार तक में मदरसों की बुनियाद रखी। 

अंग्रेज़ों के ज़माने से दीन का परचम बुलंद कर रहे मदरसा अंजुमन इस्लामिया खूनीपुर के बारे में। मुफ्ती वलीउल्लाह ने बताया कि शहर-ए-गोरखपुर तिजारती लिहाज़ से मजबूत रहा लेकिन तालीमी लिहाज़ से बहुत कमजोर था। 

इधर अंग्रेज़ों की मिशनरी धर्म परिवर्तन करने के लिए चारों तरफ मेहनत कर रही थीं। गोरखपुर में दूर-दूर तक कोई दीनी तालीम के लिए कोई मदरसा नहीं था। तब यहां के होशमंद लोगों ने तालीम से लोगों को अवगत कराने के लिये एक अंजुमन बनाई। इससे पहले भी कई अंजुमन बनी लेकिन रफ्तार न पकड़ सकी। 

मगर यह अंजुमन शुरू से ही तरक्की के साथ कदमताल कर रही है और आज भी यह सफ़र जारी है। मदरसा अंजुमन इस्लामिया खूनीपुर पूर्वी उत्तर प्रदेश का कदीम तालीमी व तरबियती मदरसा है। जो 110 साल से दीनी ख़िदमात अंज़ाम दे रहा है। 

अपने दामन में मुख्तलिफ तालीमी व दीगर दीनी विभागों को समेटे हुए तरक्की की राह पर चल रहा है। उन तमाम दीनी विभागों में वक्त के बेहतरीन उस्ताद की ख़िदमात हासिल है। 

मदरसा अंजुमन इस्लामिया का निमार्ण सन् 1901 में कुछ दीनी और इल्मी लोगों के जेरे नज़र इस्माईलपुर स्थित काजी जी के दालान में शुरु हुआ। उस समय मुसलमान दीनी शिक्षा से दूर हो रहा था। उस समय कोई दूसरा दीनी इदारा नहीं था। ऐसे में इस मदरसे की नींव रखी गई। 

शुरूआत किराए की बिल्डिंग में हुई। करीब नौ साल तक किराए के मकान में चला। अंजुमन के लिए 24 जून 1916 बेहद अहम रहा। इस दिन इसकी अपनी बिल्डिंग की बुनियाद मौलाना शाह अहमद मियां व मौलाना नियाज़ अहमद फैजाबादी ने रखी। 

सन् 1917 में इस दर्सगाह की तामीर शुरू हुई। आज इसकी खुद की शानदार इमारत है। आज़ादी के पहले अंग्रेज़ इस मदरसे के सरपरस्त रहे। उस जमाने के कलेक्टर ने इस मदरसे की बेहद तारीफ़ की थी। नवाबों ने भी इस मदरसे के लिए दिल खोलकर मदद की। हर महीने उनकी ओर से मदरसे के निज़ाम के लिए मदद आती थी। 

अंजुमन के पास सौ से ज्यादा मकान व दुकान हैं। इनके किराए से हुई आमदनी से ही मदरसा चलता है। 1921 से लावारिस लाशों के कफ़न दफ़न का काम भी अंज़ाम दिया जा रहा है। बेवाओं के इमदाद का काम बुनियादी दौर से हो रहा है। 

मुफ्ती वलीउल्लाह ने बताया कि एक बेहतरीन समाज कायम हो इसके लिए दारूल इफ्ता भी सन् 1972 से कायम है। लोगों के शादी ब्याह, वरासत वग़ैरह के मसायल के हल करने के लिए दारूल कजा भी कायम है। 

मदरसें में 21 दर्जात हैं। 38 शिक्षक तालीम दे रहे हैं। मुलाजिम 12 हैं। मदरसे में 32 कमरे हैं। 

हस्तलिखित क़ुरआन शरीफ़ व नायाब किताबों का ज़ख़ीरा 

मदरसा अंजुमन इस्लामिया की समृद्ध लाइब्रेरी है। जिसमें हस्तलिखित क़ुरआन व नायाब किताबों का ज़ख़ीरा है। करीब आठ हज़ार नायाब किताबें हैं। दीन व अदब की यह नायाब किताबें भारत में मुश्किल से मिलेंगी। इस लाइब्रेरी में हस्तलिखित क़ुरआन शरीफ़ भी मौजूद है। नौ जिल्दों में यह क़ुरआन शरीफ़ सुरक्षित है। इसकी तफ्सीरे हुसैनी है। यह बेहद नायाब है। 

मदरसे के डॉ. अज़ीम फारूकी ने बताया कि यहां बेहतरीन किताबें हैं। हस्तलिखित क़ुरआन शरीफ का जो नुस्खा है वह मुबइज्जा है। अंजुमन ने बड़े एहतियात से इसे संभाल कर रखा हुआ है। इसका कागज कमजोर हो चुका है। खोलने पर टूटने लगता है। वहीं कुछ कागज़ों को दीमक ने अपना निवाला बना लिया है। 

लाइब्रेरियन परवेज अहमद ने बताया कि लाइब्रेरी में जो किताबें हैं वह आपको भारत की लाइब्रेरियों में कम देखने को मिलेंगी। हस्तलिखित क़ुरआन व किताबें अंजुमन की अनमोल धरोहर है। 


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