तरक्की के साथ कदमताल कर रहे गोरखपुर के मदरसे


 


गोरखपुर। 

वक्त के साथ तरक्की ने रफ्तार पकड़ी। सोच बदली। तो बदल गया मदरसों का निज़ाम। मदरसों की शिक्षा की खुशबू से समाज का हर जगह रोशन है। आज़ादी के बाद मदरसों को समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का मौका मिल रहा है। 

सरकार ने भी दिलचस्पी दिखाई तो मदरसों में शुरू हुई इस्लामी शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा। दिलचस्पी और बढ़ी तो सरकार ने तकनीकी शिक्षा की शुरुआत कर सोने पर सुहागा कर दिया। 

मदरसों से हाफिज, आलिम, मुफ्ती व मौलाना तो निकल ही रहे हैं वह भी के हुनर के साथ। इन मदरसों से शिक्षा हासिल कर रहे छात्र देश के साथ विदेशों में दीन व दुनियावी ख़िदमात अंज़ाम दे रहे हैं। 

मदरसों ने लड़कियों की शिक्षा के लिए भी खास काम किया। मदरसों में पढ़ने वालों में पचास फीसदी लड़कियों की तादाद है। 

मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार जिसकी स्थापना 1960 में हुई। इसे रफ्तार 1984 में मिली। 1990 में परम्परागत शिक्षा के साथ सभी विषयों की शिक्षा शुरू हुई। करीब तीन सौ के करीब बच्चे यहां पढ़ रहे हैं। हाफिज का पहला बैच बीस साल पहले निकला। आधुनिकीकरण योजना 1994-95 से शुरू हुई। 2005 में मदरसा वित्तपोषित हुआ। 2005-2006 में प्रदेश सरकार ने मिनी आईटीआई शुरू हुई। मदरसे में लड़कियों की शिक्षा के लिए निस्वा की भी मान्यता है। 

इसी तरह दूसरा मदरसा है खूनीपुर में स्थापित अंजुमन इस्लामिया। 1901 में इसकी स्थापना हुई। नौ साल तक किराये के मकान में चला। आज इसके पास खुद की बिल्डिंग है। मदरसे की  निगरानी में लड़कियों का जूनियर हाईस्कूल भी चलता है। 

तीसरा मदरसा है चिलमापुर स्थिति मदरसा जामिया रजविया मेराजुल उलूम। इसकी स्थापना करीब 1983 में हुई। तब से लेकर आज तक तरक्की के साथ यह कदम बढ़ा रहा। 

इसी तरह कामयाबी की मिसाल है गोरखनाथ के पुराना गोरखपुर में स्थित मदरसा जियाउल उलूम। 1938 में स्थापित में यह मदरसा कई दौ सौ से आलिम दे चुका है। समाज की मुख्यधारा से जुड़ा है।

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