जंगे आज़ादी : गोरखपुर के हिन्दू राजा व मौलाना सुब्हानी की अनोखी दास्तान





जंगे आज़ादी के लिए यूरोप से लेकर पश्चिमी देशों की यात्रा की

राष्ट्राध्यक्षों से मिलकर अंग्रेजों पर दबाव बनाने कि गुजारिश की


कच्ची बाग में कब्र है लेकिन गुमनाम

गोरखपुर। 

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से तो सभी वाक़िफ है, लेकिन गोरखपुर के मौलाना आज़ाद सुब्हानी को कम लोग जानते हैं या जानते ही नहीं हैं। 

आज हम आपको बताने जा रहे हैं गोरखपुर के एक हिन्दू राजा व मौलाना आज़ाद सुब्हानी की अनोखी दास्तान। जिसने हिंन्दुस्तान की आज़ादी में अहम किरदार निभाया। जिन्होने बिना अस्त्र शस्त्र के देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी और हासिल की। देश व विदेश में व्यापक जन सम्पर्क किया। 

सूफीयाना शैली से भाईचारगी का पैग़ाम दिया। ख़िलाफत आंदोलन में आप ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। मौलाना सुब्हानी  को 'मोपलो’ से सम्बंधित कमीशन का चेयरमैन भी बनाया गया। मोपलो से सम्बन्धित मौलाना की रिपोर्ट को अंग्रेज़ सरकार ने काफी सम्मान दिया। 

अल्प आयु में मौलाना सुब्हानी आज़ादी के मतवाले, मधुर वक्ता, प्रबुद्ध लेखक, साहित्यकार बन गए। उनका सूफियाना जीवन सबके लिए आकर्षण बन गया। गोरखपुर के मोहल्ला तिवारीपुर में  उन्होंने लौकिक पारलौकिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान प्रसार का केंद्र बनाया। जन सम्पर्क को हथियार बनाया। तीन बार यूरोप, इस्लामिक मुल्कों, अमेरिका, ब्रिटेन की यात्रा कर व्यापक जन सम्पर्क किया। देश की आज़ादी के लिए प्रेरित किया। लोगों का दिल जीता। देश के बटवारे से दुखी भी हुए।


बहु भाषा ज्ञान, सभी धर्मों पर गहरी पैठ और आध्यात्मिक सूफियाना जीवन शैली से मौलाना सुब्हानी को पग-पग पर समर्थन और सहयोग मिला। श्रीनेत राजवंशी रवि प्रताप के संरक्षण से ही मौलाना की दीर्घकालिक लम्बी-लम्बी यात्राएं सम्भव हो सकीं। 

तिवारीपुर के खादिम हुसैन (अफसर) से आपका सगे भाई की तरह सम्बन्ध था। आपका ननिहाल निजामपुर में मौजूद है। उसके बावजूद खादिम हुसैन से अलग ही रिश्ता था। हाजी ख़ादिम हुसैन ने उनको रहने के लिए मकान दिया। जिसमें वह काफी समय तक रहे। उसके बाद मौलाना के पुत्र मौलाना हसन सुब्हानी वहां रहते रहे। मदरसा भी चलाया। वहीं पास में ख़ादिम हुसैन द्वारा बनवाई गई मस्जिद में आप के द्वारा लिखा खुत्बा हर जुमा को पढा जाता था। मौलाना की लड़की जमीला खातून की शादी निजामपुर के रहने वाले मोईन अब्बास से हुई। मरहूम ख़ादिम हुसैन ने आपके साथ जंगे आज़ादी में अहम किरदार निभाया। 


अपने निवास स्थान तिवारीपुर में "दायरे रब्बानी’’, और "जामए रब्बानी’’ का केन्द्रीय कार्यालय स्थापित किया। मौलाना स्वयं रब्बानी आंदोलन के जनक भी रहे। यहीं से मौलाना की प्रथम पत्रिका "रूहानियत’’ का प्रकाशन भी हुआ। 

दूसरी पत्रिका दावत का प्रकाशन किया। तीसरी पत्रिका रब्बानियत का प्रकाशन भी यहीं से हुआ। मजलिस रब्बानियत की पन्द्रह रोजा पत्रिका "दावत’’ का प्रकाशन हाजी ख़ादिम हुसैन "दावत प्रेस’’ गोरखपुर से करते रहे। 

मौलाना की मधुर जीवन शैली सबको सम्मोहित करती रही। मजदूर समर्थित मजदूर पाटी की विजय एवं लोकप्रिय एटली को प्रधानमंत्री बना मौलाना के दीर्घ जन सम्पर्क का प्रतिफल कहा जा सकता है। भारत ही नहीं  विश्व के अधिकांश देशों को गुलामी के पंजे से छुटकारा मिल गया।


मौलाना सुब्हानी एक धर्मनिष्ठ मुसलमान मुतर्जा हुसैन के पुत्र थे। उनका जन्म सन् 1882 में सिकन्दरपुर कस्बा (बलिया) में हुआ था। "गोरखपुर का इतिहास आदि से आज तक’’ पुस्तक में अब्दुर्रहमान गेहुंआ सागरी लिखते हैं कि लार्ड कर्जन हिन्दू मुस्लिम सौहार्द्र में विष घोलने का प्रयास करता रहा। गोरखपुर के लोग यहां की संस्कृति की रखवाली करते रहे। जिसका माध्यम बना सतत् जन सम्पर्क। जिसके ध्वजवाहक बने मौलाना आज़ाद सुब्हानी। 


तत्कालीन श्रीनेत राजा सत्तासी विजय प्रताप सिंह (1879-1894) की भूमिका अप्रतिम और अपूर्व-चिरस्मरणीय है। राजा अस्वस्थ होकर मृत्यु शैय्या पर पड़े थे। राजा का हालचाल लेने वालों में बलिया के सिकंदरपुर तत्कालीन गोरखपुर से आने वाले हजरत शेख़ मोहम्मद मुर्तजा का नाम काबिले गौर है। जो अपने प्रतिभा सम्पन्न बालक अब्दुल कादिर (मौलाना आजाद सुब्हानी) को अपने साथ लाए थे। मृत्यु शैय्या पर पड़े राजा का आर्शीवाद ऐसा मिला की वही बालक अब्दुल कादिर आगे चलकर मौलाना आज़ाद सुब्हानी  के नाम से मशायखों में सम्मिलित हो गया। 

मृत्यु शैय्या पर पड़े राजा विजय ने मुर्तुजा हुसैन को अपनी सदाशयता के प्रेम पास में पकड़ लिया। वह आजीवन सतासी राज के अविभाज्य अंग बन गए। राजकुमार रवि प्रताप नारायण सिंह के रख-रखाव, देखभाल का दायित्व प्राप्त हुआ।

अब्दुर्रहमान लिखते हैं कि जौनपुर के नवाब अब्दुल मजीद के संरक्षण में उन्हीं के मदरसे में शिक्षा प्रारम्भ हुई। मौलाना फजले हक खैराबादी, सैयद मौलाना हिदायतुल्लाह रामपुरी, तैयब का नाम आप के उस्तादों में अहम है। मौलाना सुब्हानी आदतन मानवता प्रेमी, आज़ादी पसंद मुसलमान थे। उनकी अरबी, फारसी, उर्दू सहित अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत पर मजबूत पकड़ थी। मौलाना के मन आंगन में स्वतंत्रता के भाव सतत् अंगड़ाई लेते रहे। 

जब प्रथम विश्व युद्ध की ज्वाला धधकने लगी तब मौलाना के युवा जीवन का अभी प्रथम पहर था। इस युद्ध में गोरखपुर वालों ने ब्रिटेन के साथ सम्मिलित होकर अपनी अग्रणीय भूमिका स्थापित की।
लेकिन अंग्रेज़ों ने यहां के लोगों से जो वादा किया वह पूरा नहीं किया। 
मौलाना सुब्हानी को इससे काफी कष्ट हुआ। वह अपनी धर्मनिष्ठ सूफियाना शैली में सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करते रहे। इस सम्बंध में आप बर्मा भी गए इस यात्रा में पूर्व राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन भी मौलाना के सहचर रहे। 

4 फरवरी 1923 को चौरी चौरा की घटना ने मौलाना को झकझोर दिया। जनपद के सभी हिन्दू व मुसलमानों को एकत्र किया गया। इस मौके पर मौलाना ने कहा कि "स्वतंत्रता प्राप्त करने की महा प्रक्रिया के प्रथम पर्व का यह प्रथम अध्याय का प्राथमिक अंश है अभी बहुत कुछ शेष है। इस घटना को आज़ादी के इतिहास की प्रथम पंक्तियों में स्थान मिलेगा। हमें सभी क्रान्तिकारियों पर  गर्व है। इसके बाद गुप्त समितियां गठित हुईं। सबने जी खोलकर प्रभावितों का खूब सहयोग किया।

मौलाना सुब्हानी भ्रमण करते रहे। इस बीच कई महत्वपूर्ण घटनाएं हुई मसलन काकोरी काण्ड, प्रथम गोल मेज सम्मेलन आदि। आज़ादी की खातिर जन चेतना जाग्रत करने का प्रयास जारी रहा। 

जब गोरखपुर आते तो अति अल्प विश्राम तिवारीपुर में करते। फिर जन सम्पर्क के लिए निकल पड़ते। रात्रि विश्राम तिवारीपुर, तिपरापुर, इलाहीबाग, निजामपुर की किसी मस्जिद में ही करते।

श्रीनेत सत्तासी राजा रवि प्रताप नारायण के आग्रह पर उनकी दूसरी महत्वपूर्ण यात्रा सन् 1936 में शुरू हुई। इस दीर्घकालिक यात्रा में आपने अफगानिस्तान, इराक, ईरान, और बहुत से यूरोपीय देशों को जागृत करते हुए मक्का शरीफ और मदीना शरीफ़  पहुंच कर देश हित में रो-रो कर प्रार्थनाएं की। दुआ कुबूल हुई। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। भारत ने इंग्लैंड का साथ दिया। लोकतंत्र के नाम पर गोरखपुर के असंख्य योद्धा सम्मिलित हुए। इस युद्ध से भारतीयों के अधिकारों का विस्तार हुआ। चीन, आस्ट्रेलिया, अमेरिका ने ब्रिटेन पर भारत को स्वशासन देने के लिए दबाव डाला। इसके बाद 1942 में गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया। 1945 में शिमला सम्मलेन हुआ। जो असफल रहा। 1946 में राजा सत्तासी रवि प्रताप ने देश में बढ़ते हुए अलगाव वाद एवं साम्प्रदायिकता के भाव से अति आहत होकर मौलाना सुब्हानी को तीसरा सफ़र करने का आग्रह किया। यह सफर यूरोप, अमेरिका और इंग्लैंड तक केन्द्रित रहा। 

इस यात्रा में मौलाना सुब्हानी ने सम्बन्धित राष्ट्रों के राष्ट्र नायकों से तो सम्पर्क किया ही, साथ ही अति विशिष्टता के साथ जन सम्पर्क भी किया। मौलाना की पूर्व यात्राओं ने ही सबको जागृत एवं सम्मोहित कर दिया था। 1946 में मौलाना आज़ाद सुब्हानी  ब्रिटेन पहुंचे तो उन्हें जन-जन का सम्मान व समर्थन प्राप्त हुआ। ब्रिटेन का जन मानस साम्राज्य वाद का विरोधी बन चुका था। इंग्लैंड में नया निर्वाचन हुआ जिसमें अति उदारवादी मजदूर दल की विजय हुई। एटली प्रधानमंत्री बना। 15 अगस्त 1947 को आज़ादी तो मिल गई लेकिन देश बंट गया। 

मौलाना सुब्हानी देश के बटवारे  से बहुत आहत हुए। महीनों लगातार रोते रहे। गोरखपुर का सम्पूर्ण जनमानस देश के बटवारे के विरोध में रहा। मौलाना सुब्हानी ने राष्ट्रवादी हिन्दू-मुस्लिम शक्तियों को संगठित एवं संघनित करने का अथक प्रयास किया था परंतु सत्ता लोलुप नेताओं के सामने राष्ट्रवादियों को झुकना पड़ा।

विभाजन मौलाना आज़ाद  के लिए अजीर्ण असह्य रोग बन गया। मौलाना सुब्हानी अस्वस्थ होन के बावजूद विश्राम को अपराध समझते थे। 1947-1957 तक खण्डित भारत वर्ष का भ्रमण करते, प्रेम और भाईचारा का संदेश देेते रहे। सन् 1957 ई. में इस अद्भुत सूफी संत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना आज़ाद सुब्हानी की जीवन यात्रा का अंतिम वर्ष रहा। कच्ची बाग तिवारीपुर के आवामी कब्रिस्तान में मौलाना चिर विश्राम रत हो गये। मौलाना का अंतिम शब्द फिक्र करो। मौलाना सुब्हानी  के अब्बासी परिजन आज भी फ्रिक और जिक्र के माध्यम से सतत् लौकिक-पारलौकिक शिक्षा, सदाशयता एवं भाईचारा के प्रचार-प्रसार में अग्रसर हैं। 

गौरवमयी, उदारवादी शीतल बयार जो सर्वधर्म होकर श्रीनेत सत्तासी राजा रवि प्रताप के सुषुप्त गुप्त सरंक्षण में चली, उसने भारत ही नहीं सारे विश्व से साम्राज्यवाद के बड़े-बड़े शक्ति सम्पन्न किलो को धराशाही कर दिया। सन् 1964 में श्रीनेत राजा रवि प्रताप नारायण सिंह भी अनंत में विलीन हो गए। राजा ने अपनी आख़िरी  सांस इमीलीय मध्य प्रदेश में ली। मौलाना सुब्हानी व राजा रवि प्रताप की शख्सियत बहुत बड़ी थी। जिन्हें इतिहास के पन्नों में जगह न मिलना अन्याय है।

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2 टिप्पणियाँ

  1. आज ही इनके बारे में मैं पढ़ रहा था. 1939 में सिलहट की एक सभा में उन्होंने बड़े विस्तार से इसका जिक्र किया था, कि कैसे उस वक्त के 21 करोर हिंदू मुसलमानों के सबसे बड़े और ताकतवर शत्रु हैं. और इसीलिए अंग्रेजों को भूल कर हिंदुओं को परास्त करने के लिए मुसलमानों को तैयार होना चाहिए. अंबेडकर की किताब 'पाकिस्तान, या भारत का विभाजन' में उनके भाषण का अच्छा खासा हिस्सा दिया गया है.

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  2. 'अगर भारत में कोई महत्वपूर्ण नेता है जो इस देश से अंग्रेजी को भगाने के पक्ष में है, तो वह नेता मैं हूं। इसके बावजूद मैं चाहता हूं कि मुस्लिम लीग की ओर से अंग्रेजी के साथ कोई लड़ाई न हो। हमारी बड़ी लड़ाई हमारे 22 करोड़ हिन्दू दुश्मनों के साथ है, जो बहुमत का गठन करते हैं। केवल साढे चार करोड़ अंग्रेजों ने व्यावहारिक रूप से शक्तिशाली बनकर पूरी दुनिया को निगल लिया है। और यदि इन 22 करोड़ हिंदुओं को, जो सीखने में, बुद्धिमत्ता में और धन के आकार में समान रूप से उन्नत किया गया है, यदि वे शक्तिशाली हो जाते हैं, तो ये हिंदू, मुस्लिम भारत और धीरे-धीरे मिस्र, तुर्की, काबुल, मक्का, मदीना और अन्य मुस्लिम इलाकों को भी निगल लेंगे. यजज-मजूज (यह कुरान में इतना उल्लेख किया गया है, कि दुनिया के विनाश से पहले वे धरती पर दिखाई देंगे, और जो कुछ पाएंगे वे नष्ट होंगे)।
    "अंग्रेजी धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हैं ... वे निकट भविष्य में भारत से चले जाएंगे, इसलिए यदि हम इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मनों, हिंदुओं से अब तक नहीं लड़ेंगे और उन्हें कमजोर करेंगे, वे न केवल भारत में रामराज्य स्थापित करें, लेकिन यह भी धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैला देंगे । यह 9 करोड़ भारतीय मुसलमानों पर निर्भर करता है कि या तो वो खुद को मजबूत करें, या उन्हें (हिंदुओं) को कमजोर करें। इसलिए प्रत्येक धर्मनिष्ठ मुसलमान के लिए जरूरी है कि वह मुस्लिम लीग में शामिल हों, ताकि हिंदू यहाँ स्थापित न हों, और अंग्रेजों के प्रस्थान तक इस्लामी शासन स्थापित हो जाए।
    "हालांकि अंग्रेजी वर्तमान में मुसलमानों के दुश्मन हैं, फिर भी हमारी लड़ाई अंग्रेजी के साथ नहीं है। पहले हमें मुस्लिम लीग के माध्यम से हिंदुओं के साथ एक समझौते पर पहुँचने की जरूरत है। फिर हम आसानी से अंग्रेजी को भगा कर भारत में मुस्लिम शासन स्थापित कर लेंगे.
    "सावधान रहें: कांग्रेसी मौलवी के जाल में मत आओ, क्योंकि मुस्लिम दुनिया, 22 करोड़ हिंदू दुश्मनों के हाथों में कभी सुरक्षित नहीं है'.
    - खिलाफत जमाने के एक मुस्लिम नेता मौलाना आजाद सुभानी का 1939 का एक भाषण का हिस्सा

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